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My husband kisses my eight-year-old son every minute when they sit together. Is this normal? Do you do this with your child?

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If you have asked this question publicly, means there is a serious problem. I know no one can understand your words, but, yes, I can. Let me explain it systematically.
According to sigmund freud, father of psychology, “’Libido” is a driving force of human life. Even our birth is due to Libido of our parents. We love our child because there is a tint of Libido in side. Believe me, when Freud put on theory of Electra and oedipus complex, so called society protectors tried to kill him. Here he explains Electra complex as Daughter is attracted to Father and Oedipus complex as Son attracted to Mother. He explains this, it is because of our natural desire to choose a life partner when we grow up.
The problem is, if a male i.e. father loves physically tooooo much to another male, son, the father is creating a GUY. If a mother loves toooo much to her daughter she is creating a lesbian. Because nature has given us some natural psychological parameters to behave as a complete man or woman.
But the problem starts when somebody cross the limit. Suppose i am shouting at my child at his fault. This is normal behavior. But if i start to shout at my child every minute..its a problem with me.
When we ask questions on social forums like Qura or any other, people are not expert on the subject. They are not trained doctors so they start to give advices depending on their commonsense. But your question is beyond normal behavior. So please consult the psychologist, or your husband will spoil life of your child.
I handle one case few years back. One family came to me with 2 months daughter in their arms, stating that a wife is lunatic, and does not allow father to handle his own daughter. Everyone blamed the lady and declared her as lunatic.
I got deep into the roots of the problem, there i found father used to play with private part of his 2 months old own daughter. When she is pissing he used to suck… etc. This was very embarrassing to a lady even to explain it to others. again her family was having big royal background. Then she was only protecting a child. In this case also, father was not at the fault, with proper counseling he became normal.
Mean to say, people look normal but they actually are not. So my advice is that please ask your husband to consult a psychologist.
All the best,

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वृद्धाश्रम एक सामाजिक समस्या:Old Age Home, Must read, top blog, thinking blog, discussion of social problems, old age problems



वृद्धाश्रम एक सामाजिक समस्या:

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दो साल आठ महिने सत्तावन दिन, तीन सौ से भी ज्यादा वोलिएंटियर्स जुटे थे एक महत्वपूर्ण काम के लिये जिसमे दो हजार एक सौ तैंतीस परिवार और उतनेही वृद्ध लोगोंका सर्वे किया गया... सर्वे बेहद सवेदनशील मुद्दे पर था.. वृद्धाश्रमों कि भारत देश में बढती संख्या.. और उसके समाज मानस पर होनेवाले परिणाम!

इन सबका एक महत्वपूर्ण हिस्सा था, कि क्या 'सभी बहुएँ या बेटे इतने बुरे होते है', जिसका एक चित्र समाज के सामने फिल्म या कथा कादम्बरी मे दिखाया जाता है

 हमारे इस अध्ययन के नतीजे बेहद चौकानेवाले है.


सबसे पहले हम ये जानेंगे कि ये वृद्धाश्रम होता क्या है? कहाँ से इसकी शुरुआत हुयी? क्या ये मानव संस्कृती का हिस्सा था? अगर नहीं तो इसकी शुरुआत कैसे हुई?

हजारो वर्ष पहले इंसान जब खेती करने लगा तब मानवी समाज ने संस्कृति कि रचना की. जिसमे परिवार की रचना हुयी. परिवार इस संस्था के कुछ अलिखित नियम थे. और ये नियम आज भी जैसे के वैसे ही है. जैसे कि इंसान का परिवार उसके विवाह बंधन के साथ शुरू होता है. एक पुरुष और एक स्त्री ने जनम भर एक साथ रहना यह विवाह के नियम से भी पहले का नियम था जो एक कुदरती संकेत था. जैसे कि "सारस" या"क्रोंच" पंछी का अध्ययन किया तो इनमे जो जोडे बनते है वो जीवन भर एक साथ रहते है. एक जोडीदार के मृत्यु के पश्चात दूसरा जोडीदार अन्न पानी को त्याग देता है. और स्वयम मृत्यु को गले लगाता है. उसी प्रकार इंसानो को जवानी मे अपने पार्ट्नर से प्यार हो जाता है. और फिर वो अपने बच्चोंको जन्म देते है. बच्चोंको बडा करने मे उनको बडा आनंद आता है. बच्चे अपने माता पिता से बेहद प्यार करते है. जब वो बडे हो जाते है, तो वो अपना अपना पार्ट्नर ढूंढते है. 

मजेदार बात ये है, सम्पूर्ण विश्व पाँच खंडोन्मे विभाजित है. इसमे चार प्रमुख मानवी प्रजातिया है युरोपियन, मंगोलियन, निग्रो, भारतीय (एशियन) आजसे हजारो वर्ष पहले इनका आपस मे कोई मेल नही था. क्योंकी बीच मे बहोत विशाल महासागर थे. फिरभी कुछ दिलचस्प बाते इंसानोंके साथ हुयी. इसमे एक बात है, "लडकी का ससुराल जाना". इंडो-अमरिका, युरोप, जापान, चायना, हिंदुस्तान, ऑस्ट्रेलिया किसी भी महाद्वीप को लिजिये. लडकी हमेशा ससुराल जाती है, लडका नहीं जाता. किसने यह नियम समस्त मांनव समाज के लिये बनाये? अग्नी पर खाना पकाकर खाना, कपडे सिलकर पहनना.. किसने सभी इंसानोंको सिखाया यह अभी तक रहस्य ही है. 

बच्चे जब अपना परिवार बसाते है तो उनके परिवार को मार्ग दर्शन देनेका काम माता- पिता करते है. अब धीरे धीरे समय गुजरता जाता है. बच्चोंके बच्चोंकी भी शादिया हो जाती है. अब वृद्धावस्था मे पहूँचे माता पिता कि जिम्मेदारी बच्चे उठाते है जो खुद अधेड उम्र हो गये है. क्योंकि ऐसा उन्होने नहीं किया तो जब वो खुद वृद्ध हो जायेंगे तब उनके बच्चे उनका खयाल नही रखेंगे. 

हर धर्म के बुनियादी नियमो में घर के वृद्ध सदस्योंकी जिम्मेदारी शामिल होती है. हर समाज के अलिखित नियमो मे वृद्धोंको सम्भालना नैतिक जिम्मेदारी बताई गई. ऐसा ना करने पर उस वक्त ऐसे बेटोंका सामाजिक बहिष्कार किया जाता था, ऐसे बेटोंको दुष्ट समझा जाता था. उनके यहाँ कोई रोटी-बेटी का व्यवहार नही करता था. धर्म ने जो कानून बनाये उसमे वृद्धोंकी देखभाल पुण्य का काम और उनका ख्याल ना रखना पाप माना जाता था. इसीलिये भगवान (या अपने अपने सर्वशक्तिमान अदृष्य शक्तियाँ) इनसे डरकर लोग वृद्धोंका सम्भाल करते हैं. 

इसके पीछे एक स्वार्थ भी होता था, कि अगर हमने अपने बुजुर्गोंकी सेवा नही की तो हम स्वयम जब बूढे हो जायेंगे तो हमारी सेवा करने से शायद हमारे बच्चे इन्कार कर सकते है. 

दूसरे प्राणियोंसे विपरीत इंन्सानी बच्चा धीरे धीरे बडा होता है. चतुष्पाद प्राणियोंके बच्चे पैदा होतेही चलने लगते है. अपने आप खाना खाने लगते है. इन्सान के बच्चे को यह सब सीखना पडता है. वो अपने आजू बाजू का माहोल, भाषा, संस्कृति देखकर सीखता है.

खेती करनेवाला समाज अचानक एक विशेष उत्थापन से गुजरने लगा. वो मानवी मस्तिष्क जो पिछले हजारो साल से धीरे धीरे विकसीत हो रहा था वो उन्निसवी शताब्दी के बाद अचानक उन्नत हो गया. और इंसान ने बहोत तांत्रिक प्रगती की. बीसवी शताब्दि मानवी समाज के लिये बेहद महत्वपूर्ण थी. क्योंकि मानवी ब्रेन के सोचनेकी क्षमता इसी सदी मे बहोत बहोत बहोत ज्यादा बढ गयी. तंत्रग्यान अपनी चरम सीमा पर पहूँच गया.
अठारहवी और उन्नीसवी शताब्दियोंके दरमियान न सिर्फ तांत्रिक प्रगति हुई, बल्कि समाज के नियमोंके, धर्म के नियमोंके विरुद्ध जाने कि सोच निर्माण होने लगी. अब लोगोंको जिस भगवान मे अटूट विश्वास था उसकी जगह दूसरे भगवान ने ली, वो था "पैसा". इस नये भगवान के अंदर बहोत ज्यादा ताकद थी यह भगवान पाप करने से रोकता नही था. यह भगवान समाज के देश के कानून से ऊपर था. उसे पाने के अच्छे तरीकोंसे ज्यादा बुरे तरिके भी इंसान ने खुद ढुँन्ढकर निकाले थे. 

इंडस्ट्रियल रिवोल्युशन मानवी समाज की धज्जियाँ उडानेवाला परिवर्तन था. उसीकी बदौलत 'अण्डर वर्ल्ड' गुनहगारोंके देवताओंकी दुनिया निर्माण हुई. इण्स्ट्रियल रिवोल्युशन ने तानाशाह पैदा किये जिन्होने विशाल विश्व महायुद्ध रचे. ध्यान दीजिए, हमने दो विश्व युद्ध नहीं देखे बल्कि वो एक ही विश्वयुद्ध था सिर्फ कुछ समय के लिये बीच में वो शांत था. 'अण्ड्र वर्ल्ड' के राक्षसी लोगोंका दायरा सीमित था, तानाशाहोंका दायरा राष्ट्रव्यापी हुआ करता था.इतनाही फर्क, लेकिन दोनोंकी मानसिकता एक ही हुआ करती थी. 

इस बीच जिसके भरोसे सम्पूर्ण मानव समाज चलता है, उस मध्यम वर्ग मे भी भयंकर बदलाव आ गये. अब लोग हर चीज को पैसे से तौलने लगे. राहगिरोंको पानी पिलाना यह हर एक समाज की सीख थी. अब पानी पिलाना धंदा बन गया. अतिथी को भोजन देना किसी जमाने मे धर्म का काम था, अब यह धंदा बन गया. यहाँ तक कि खुद के न्याय के लिये किसी का खून करना शायद जायज था, लेकिन सुपारी लेकर लोगोंकी जान लेना अब धंदा बन गया. 

इसी बीच हर देश मे होनेवाला विद्यादान का पवित्र कार्य अब स्कूल कोलेजो मे परिवर्तित हो कर धंदा बन गया. अब फ्री मे मिलनेवाला पानी 'सरकार' से हमे खरिदना पड रहा था. हर एक कुदरती चीज का भी दाम निश्चित हो गया. इस दाम को चुकाने के लिये इण्डस्ट्री मे काम करना अनिवार्य हो गया. लोग प्रोफेशनल होते गये. ज्यादा पैसा और ज्यादा पैसा ऐसी होड मच गयी. 

खेती मे काम करनेवाले पुरुषोंके साथ हमेशा महिलायें भी काम करती थी. लेकिन वो अपने बच्चोंको खेत मे ले जा सकती थी या, घर मे किसी बुजुर्ग के पास वो रख सकती थी. इसीलिये बच्चोंका परिवार के साथ 'बोंडिंग' पावर फुल था. खेती का काम सूरज डूबने के साथ खतम होता था और अपने परिवार के अलावा कोई मनोरंजन नही था. इसीलिये बुजुर्गोंसे सलाह लेना कहाँनियाँ सुनना, जीवन का अभिन्न अंग था. भावनाये तब तक इंसान के मन मे जीवित थी. लेकिन अब रिश्ते नाते, भावनायें इन सबको पैसे के माध्यम से तौलने जाने लगा.

तीन लोगोने पूरे मानव समाज को उन्नत बनाया और सामाजिक जीवन ध्वस्त कर दिया. इन इंसानोंके ब्रेन की ताकत को मै सलाम करता हूँ. इनमे सबसे पहले सबसे उपर है "टेस्ला" जिसने बिजली ढूँन्ढकर निकाली. उसीकी बदौलत आया दूसरा अविष्कार "बल्ब"! सर "हम्फ्रे डेवी" जिन्होने 'एडिसन के जन्म से भी पैतालिस साल पहले 'बल्ब' को ढूँढकर निकाला. और एडिसन से भी पहले नौ देशोमें अलग अलग सायंटिस्टोने 'बल्ब' खोजकर निकाला. मुझे गुस्सा आता है तब, जब हमारी इण्डियन एज्युकेशनल सिस्टम अभी भी बच्चोंको यही पढा रही है, कि बल्ब एडिसन ने ढूंढ्कर निकाला. 

बहरहाल, इस बल्ब ने मनुष्य जीवन को उथल पुथल कर रख दिया. जो समाज इससे पहले रात को अंधेरा होते ही सो जाता था, वो अब बल्ब की रोशनी मे जागने लगा. और कुदरत के नियम के विरुद्ध जीने लगा. क्योंकि हर एक पशु एवम पन्छियोंको कुदरत ने सूर्य के साथ कि दिनचर्या दी. जिसमे दो प्रकार के जंतु है. एक दिनमे जागने वाले और रात को सोने वाले. दूसरे रात को जागनेवाले और दिन को सोनेवाले.ये सब लाखो वर्षोंसे ऐसा ही चल रहा था जब तक हमारे जीवन मे बल्ब नही आया. इलेक्ट्रिक बल्ब आने से इंसान अब रात को आठ बजे की जगह नौ बजे सोने लगा. दूसरे एक इंसान ने सम्पूर्ण मानव जाति को प्रभावित किया, वो था, "जॉन लॉगी बीअर्ड" जिसने हमे टी.वी. दिया. टीवी हमारे जीवन मे आने के बाद इंसान अब रात के दस बजे सोने लगा और तीसरा इंसान था, "रॉबर्ट काह्न और बहोत सारे" जिन्होने हमे 'इंटरनेट' दिया. अब तो इंसान रात रात भर जागकर अपने ग्यान कि कक्षा बढाने का काम करने लगा. इसके विपरीत परिणामोंकी विस्तृत चर्चा हम 3 रे पाठ मे करेंगे.

पैसे की होड मे हमने टि.वी. से अपने बच्चोतक हिंसा पहुँचाई. संस्कारोंकी धज्जियाँ उडाना धर्म का मजाक उडाना सामाजिक सांस्कृतिक नियमोंको तोडना अब मजाक बन गया. और एन्टरटेनमेन्ट के नाम पर हम अपने पारिवारिक जीवन के बुनियादी ढाँन्चे को जड से उखाडने में लगे रहे. तब तक हमारे प्राचीन महाकाव्य जिनमे संस्कृति का दर्शन था पीछे छूट गये थे....

टि.वी. के बाद स्मार्ट फोन हाथ मे आ गये तो अब इंडिविज्युअलिजम बढने लगा. माता पिता दोनो जब उन्निसवी शताब्दि तक आते आते पैसा कमाने के लिये शहरो मे आये, तो अपने अपने माता पिता को वो गाँव छोड आये. क्योंकी शहर के घर छोटे थे. शहर कि जीवन शैली अलग थी. 

पिछली शताब्दी मे खाने पीने की आदते, स्वच्छता के मायने, गाँव कि संस्कृति से काफी भिन्न थे. पारम्पारिक रूप से जब हम खेती मे जाते थे तो बच्चोंके लिये दो पर्याय थे. एक, उनको साथ लेकर जाना, या दूसरा, बुजुर्गोंके पास उन्हे छोडना. मॉडर्न लाईफ स्टाईल मे माता अपने बच्चे को साथ नही लेकर जा सकती, और घर मे कोई बुजुर्ग है ही नही. यही पर शुरुआत हुयी "बेबी सिटिंग" कि..

क्या आपको मालुम है, "बेबी सिटिंग" ही वृद्धाश्रम कि बुनियाद है. जो माता पिता अपने बच्चोंको बेबी सिटिंग मे रखते है, वो सही मायने मे अपने लिये वृद्धाश्रम जाने के लिये नीव डाल रहे है. क्योंकि माता पिता कि जब सबसे ज्यादा जरुरत होती है बच्चेके पैदा होने से सात आठ साल तक. लेकिन उसे हमने अपने सीने से तोडकर एक ऐसी जगह पर डाला है, जहाँ पर अपने अंतर्मन में एक ही सीख प्रिंट कर रहा है. मै भी बडा होकर अपने माता-पिता जैसा ही बनूँगा. जो सिर्फ पैसे के पीछे दौडेगा, जिसमे प्यार नाम की चीज ही नही होगी. क्योंकि जब रात को माता-पिता घर पे लौटते है, तो वो थके हारे होते है, बच्चे कि किसी भी बात को ना सुनते हुये, जैसे तैसे खाना खाकर सो जाते है, या आपस मे झगडते है, या अपने भविष्य के बारे मे चिंता करते रहते है, या ऑफिस का 'पेंडिंग वर्क' पूरा करते है.

हमने शुरुआत से ही जाना कि इंसान क बच्चा वही करता है, जो उसे सिखाया जाता है. आज वृद्धाश्रम मे ज्यादा से ज्यादा वोही लिग है, जिन्होने अपने बच्चोंसे प्यार नहीं किया बल्कि उन्हे "बेबी सिटिंग" मे रखा. अब बच्चा भी बोल रहा है, "मम्मी- पपा, नेरे पास आपके लिये वक्त नहीं है. पैसा बहोत है. (आपने भी वही किया था याद है?)

अंग्रेजोंके शासन काल मे हमे जो एज्युकेशन दिया गया उसमे छुपा अजेंडा था ईसाई धर्म के सिद्धांतोंको हमारे दिमाग में इंजेक्ट करना. प्राचिन हिंदु संस्कृति परिवार, धर्म एवम बुजुर्गोंको केंद्र स्थानमे रखती थी. ईसाई धर्म व्यक्तिस्वातंत्र्य, स्वैरवाद इनको ज्यादा महत्व देता है. 

हमारे एज्युकेशनल सिस्टम के अंतर्गत स्वैरवाद इस तरिके से फिट कर दिया गया कि आधुनिक विचार मतलब, बुजुर्गोंका अनादर करना, धर्म के मूलभूत नियमोंको तोडना. यानी धर्म कहता है कि शराब पीना धर्म को मंजूर नही. तो आधुनिक विचार वाले (पाश्चात्य संस्कृति मे) पढे लिखे लोगोने शराब पीना, स्टेटस सिम्बोल बनाया. और जो मित्र शराब को छुयेगा भी नही उसे तुच्छ नजरोंसे देखा गया. धर्म कहता है, बहु बेटियोने सम्पूर्ण कपडे परिधान करने चाहिये तो पाश्चात्य संस्कृति मे पढे लिखे लोग शरीर को खुला रखना आधुनिकता कि निशानी मानने लगे. धर्म कहता है, कि भगवानोंके रुपोंकी पूजा कि जानी चाहिये तो भगवान का मजाक उडाना फेशन बन गया. 

पिताजी का सम्मान करना चाहिये, उनसे आदर के साथ पेश आना चाहिये तो हमने पिता होकर पुत्र को पहले मित्र बनाया. फिर, पुत्र गाली देकर पिता को सम्बोधित करता है इसके उपर बाप को नाज मालूम होता है. पुत्रि को पुत्र को हमने सिखाया कि उसकी माता (कई बार पिता को भी ) नाम से पुकारे, क्योकि परिवार के सदस्य मित्र बनकर एक हि प्याले मे शराब पीते है. 

अब यही पुत्री किसी की तो बहू बनेगी.. जिसे बुजुर्गोंका सम्मान करना सिखाया ही नही. वही बेटा किसी और का भी तो एक दिन बाप बनेगा जिसे अपनी इज्जत खुद कैसे उतारते है, इसीका हमने प्रशिक्षण दिया हुआ है. अब जब हम बूढे हो जाते है तो किसी काम के लायक नहीं रहते, तो जाहिर है, वो हमें वृद्धाश्रम मे ही भेजेगा. बहू को बुजुर्गोंकी अब अडचन होने लगती है... क्योंकि मेरी बहू किसी मेरे ही जसे बंदे कि बेटी है.. तो दोष किसका..

जब मेरा सिखाने का वक्त था तो मेंने उसे बुजुर्गोंके साथ कैसे बर्ताव किया था ये बताया था. जब मै गाँव जाता था तो बुजुर्गोंको मै रिस्पेक्ट कर ही नहीं रहा था. मै उनके उपर नोटोंकी गड्डि फेककर चला आता था. मैंने ही मेरे बच्चोंको सिखाया कि अपने से बुजुर्गोको दूर रखो क्योंकि गाँव के लोग गंदे होते है. अगर वो छूते है तो डेटोल से हाथ साफ करो. बस ये उसकी अंतरमन मे बैठ जाता है और जब हम खुद बूढे हो जाते है तो वो हमारा बेटा हमारे पास आने से डरता है, क्योंकि "बूढे लोग गंदे होते है.." मैंने ही तो सिखाया..

जैसे मैंने अपने माँ बाप को गाँव में छोडा और शहर आया वैसे बच्चे भी वो ही करते है, हमे "गावोंके देश मे पीछे छोडकर, शहरोंके देश "विदेश" मे चले जाते है." हमारे बच्चे तो बस हमारा ही सिखाया हुआ नियम बहोत बडे पैमाने पर लागू करते है. लेकिन मजेदार बात ये है, कि अंतर उतनाही है. अपने माँ बाप के गाँव से शहर आने के लिये हमे चौबीस घण्टे लगते थे, अब उसे भी यहाँ से विदेश जाने के लिये मात्र चौबीस घण्टे ही लगते है. 

क्या आपको मलूम है कि वृद्धाश्रम दो प्रकार के होते है, एक जिसमे हम भाडे से रहते है, और दूसरा जिसके मालिक हम होते है. पहला वाला वृद्धाश्रम दिखता है, दूसरावाला दिखता नहीं इतना ही फरक है, बच्चे जब विदेश जाते है तब एक अपरिहार्यता के साथ उस घर मे बुजुर्गोंको रहना पडता है, जिसका वो खुद का मालिक है. 

समाज के उत्थापन कि चर्चा जब हमने कि तब हमने व्यक्ति स्वातंत्र्य कि बात की. उसी व्यक्ति स्वातंत्र्य के साथ और भी एक बात हो गयी के हम समाज से कब अलग हो गये हमे ही पता नही चला. 
मनुष्य यह समाज मे रहनेवाला जीव है. लेकिन दूसरे वृद्धाश्रम मे (अपनेही घर मे कैद) रहनेवाले लोगोने अपने आजू बाजू के लोगोंसे भी नाता रिश्ता तोड दिया है. क्योंकि उन्हे अपने पडोसी पसंद नही है. उसे अपने रिश्तेदार पसंद नहीं है. पैसा कमाते कमाते असली भगवान को भूलकर 'पैसा' नाम के भगवान को पूजते पूजते उसने अपने आप को समाज से अलग कर दिया है. यहाँ तक कि अपने बच्चोंसे भी उसने नाता तोड दिया है. कई बार ये देखा जाता है, कि एक ही शहर मे दो घर होते है. और माँ बाप से बच्चे दूर रहते है. ऐसा अक्सर नहीं होता कि माँ बाप को बेटा दूर रखता है, माँ बाप ही परिवार के साथ नही रहना चाहते. बुजुर्ग होने के बावजूद भी उन्हे व्यक्तिगत स्वातंत्र्य चाहिये. 

कई बार पारिवार के लिये मेहनत करके खुद इंसान इतना स्वार्थी बन जाता है, कि उसे बच्चोंका प्यार नजर ही नहीं आता, क्योंकि उसने अपनी जवानी मे केवल पैसा पैसा और पैसा ही किया है. अब उसे लगने लगता है कि सब लोग, बच्चो समेत उसके पैसे के पीछे है. नौकरोंसे उनका बर्ताव 'तानाशाह' जैसा होने लगता है. तो नौकर भी नही टिकते. या जो शातिर नौकर होता है वो मौके की तलाश मे रहता है. कई बार ऐसी घटना हो जाती है, कि वृद्धा व्यक्ति अपने फ्लेट मे अपने घर मे मर जाते है और लाश सडने के बाद पडोसियोंको पता चलता है. इसमे पडोसियोंसे रिश्ता ना रखना, रिश्तेदारोंकी कद्र ना करना इत्यादि 'गुण' शामिल होते है, तो इतने भयंकर परिणाम निकलते है.

इसमे अब अलग अलग पहलुओंकी हम चर्चा करेंगे. जिसमे खास करके पुरुषोंके लिये लागु होने वाला घटक है, "सेक्श्युएलिटी"! चौक गये? चौकने कि आवश्यकता नही है. कई बार साठ कि उम्र के बाद या उसके दरमियान किसी पुरुष का कुछ मेजर ऑपरेशन हुआ तो उसे अलग अलग स्टेरोइड्स दिये जाते है, जिसके कारण उसकी उत्तेजना बढ जाती है.

हॉस्पिटल से घर आने के बाद वो अब बदला हुआ इंसान होता है. उसकी पत्नि अब सेक्श्युअली रिटायर्ड होने के कारण घर कि अपनी जवान बेटियाँ या बहुओंपर यह बुजुर्ग बंदा गंदी नजर डालने का काम शुरू होता है. इसमे कई बार बहू बेटियोंको या चौदा पंधरह साल की पोतियो को छुप छुप के देखना. जान बूझकर उन्हे 'अलग' प्रकार से स्पर्श करना इत्यादि शुरु हो जाता है. 

फिर बंद मुठ्ठी सवा लाख कि कहकर अचानक ऐसे बुजुर्गोंकी रवानगी वृद्धाश्रम मे होती है. ना वो ना घर का कोई सदस्य ठीक ठीक जवाब दे पाता है कि आखिर वृद्धाश्रम कि नौबत क्यो आयी... एक केस मेरे पास आया था, बहोत बडी फ़ेमिली के लोग थे. उस बुजुर्ग ने बहू बेटे के रुम मे और टॉयलेट बाथरूम मे भी मायक्रो केमेराज लगाये थे. जब इसका पर्दा फाश हुआ तो ना सह पा रहे थे, ना बता पा रहे थे. समाज मे बडा रुतबा, देश विदेश मे फैला कारोबार सलाह ले तो किसकी सलाह ले? विडम्बना देखिये, बेटेने ही जो वृद्धाश्रम बनवाया था उसीमे खुद के पिता को रखनेकी नौबत आ गयी.

यह सिर्फ पुरुषो मे होता है ऐसा नही, स्त्रियो मे भी होता है. फरक सिर्फ ये होता है, कि पुरुष दूसरे, या दूसरे किसी की स्त्री को ऐसा वैसा देखना चाहता है. और औरते अपने आप को एक्झीबीट करती है. एक महिला का केस मेरे सामने आया. जिसका पती काफी साल पहले मर चुका था. लडका और माँ दो ही लोग घर मे रहते थे. दोनो मे काफी दोस्ताना माहोल था. इतना कि माँ नहाने के बाद सिर्फ तौलिया लपेटकर बाहर आ जाती थी, उपर बिना कुछ पहने. लडके की शादी हो गयी, लडकी संस्कारी घर की थी. उसने माँ के उपर ऑब्जेक्शन लिया. माँ कि दलील थी कि मेरे घर मे ऐसा ही माहोल रहेगा. बहू ने अपने आप को एड्जस्ट किया. महिने बीतते गये साल गुजरते गये. बेटा एक्सीडंट मे मर गया. उसका बेटा अब बारह साल का हो गया. दादी कि इन हरकतोंसे परेशान बहू को डिसिजन लेना ही पडा कि किसी वृद्धाश्रम मे इन्हे रखे.  समाज कहने लगा बहू कितनी खराब है, सास को इस उमर मे वृद्धाश्रम भेजती है..

आजकल नेट सस्ता होने के कारण और 'पोर्नोग्राफी' इजिली अवेलेबल होने के कारण कई बार बुजुर्ग अपने लेप्टोप मे या स्मार्ट फोन मे पोर्न विडिओ चालू रखकर ही सो जाते है. और फिर जिस घर मे बारह तेरह साल के बच्चे इसे देखते है. 

फिर बडी ऑकवर्ड सिच्युएशन तैयार हो जाती है. 'पोर्नोग्राफी' एक बुरी लत है. जैसे सिगारेट, शराब का व्यसन होता है, वैसे ही यह एक व्यसन होता है. इसे व्यवस्थीत रीती से छुडाना पडता है. एक बार एक तेरह साल कि लडकी को उसकी माँ ने बेहद बुरी तरीके से पीटा, क्योंकि वो पोर्न विडिओ देख रही थी. केस का गहरा अध्ययन किया तो पता चला उसके नानाजी बच्ची स्कूल जाने के बाद उसके बेडरूम मे पी.सी. मे 'पोर्न' देखा करते थे. लेकिन कम्प्युटर की ज्यादा जानकारी नही रखते थे. इसीलिये 'ब्राउजिंग हिस्टरी' को बिना डिलिट किये ऐसे ही छोड देते थे. लडकी जब दोपहर को घर आती थी तो माँ बाप दोनो जोब पर गये हुये होते थे. फिर ये बेडरूम मे दिनभर 'पोर्न' देखा करती थी. 

दोष हमारा ही है. हमने ही बच्ची को गलत रास्ता दिखाया फिर नानाजी को बार बार चेतावनी देने के बावजूद भी नही सुधर पाये तो उन्हे वृद्धाश्रम भेजा गया. 
   
एक और कारण जो सामने आता है वो है, एडजस्टमेंट! इसके बारे में हम जरा विस्तार से जानकारी लेंगे. वृद्धाश्रम मे बडी संख्या मे ऐसे लोगोंको भी पाया गया जिनकी वाईफ या जिनका हजबंड हसी खुषी से परीवार के साथ रहते है. फिर ऐसी क्या बात हो गयी कि उन्हे वृद्धाश्रम छोडा गया?

अपनी जवानी मे ये लोग बहोत कष्ट एवम आपदा उठाकर आगे बढते है. देखते देखते अपने आप को ये घर का भगवान डिक्लेअर कर देते है. अब इनकी घर के किसी सदस्य से नही पटती. ये एकदम हठी और जिद्दि बन जाते है. इतने ज्यादा निगेटिव बन जाते है, कि हर किसी के नाक मे दम कर रखते है. हर बात पे खिट खिट करतेही रहते है. अपनी ताकद और सोच कमजोर होने के बावजूद भी अपने कंट्रोल को छोडना नहीं चाहते. अपने पति या पत्नी के साथ हर क्षण ये लडते रहते है. बच्चोंके बच्चे आने के बावजूद भी नही सुधरते है. इसीलिये फिर इनको सुधार गृह मे भेजा जाता है, जिसे वृद्धाश्रम के नाम से जाना जाता है.

जब हम खुद जवान थे तब हम हर किसी के गाईड थे. लेकिन अब हमारे गाईडंस की जरूरत किसीको भी नही है. इस बात को समय चलते समझ लिजीए. तेज रफ्तार से तांत्रग्यानिक बदलाव आये है. उन्हे समझने का प्रयास किजीए.

 'हमारा जमाना, और आजकल का जमाना' ये रोना बंद किजीए. 

समय बदल रहा है तो हमे भी बदलना पडेगा. पहले वो जमाना था कि जब आपका बाप आपको पीटता था तो आपको बाप को पूछने कि हिम्मत नही थी कि मेरा कसूर क्या है? लेकिन आज कल के पांच साल के बच्चेको भी आपने चांटा मारा, या सिर्फ डाँटा तो भी आपसे एक्स्प्लनेशन मांगेगा. और सही एक्स्प्लनेशन ना देने पर वो बगावत भी करेगा. 

एक बार एक दादाजी ने तीसरी कक्षा के पोते को गणित सिखाते वक्त जोरसे चांटा मारा. (क्योंकि गणित ना आने पर उनके पिताजी भी 'उनके' साथ यही करते थे) तो दूसरे दिन इतनी छोटे बच्चे कि लाश बाथरुम मे पायी गयी. अपने दादाजी के नाम तो वो चिठ्ठी छोड गया था. और मरने से पहले उसने नेट पर 'रिसर्च' की थी कि दादाजी ने गुस्सा करने के बाद क्या करना चाहिये. तो किसीने मजाक मे लिखा था, बाथरुम के चुल्लुभर पानी मे डूब मरो.' शब्दोंका अर्थ ठीक नासमझने पर उस नन्हे मासूम को जान से हाथ धोना पडा. अब क्या होगा उस बुजुर्ग का? जब तक वो बेचारे जीवित रहेंगे तब तक हर पल मरते रहेंगे. बताने कि जरूरत नही है, कि बहुरानी ने उनसे बदला ले लिया उन्हे वृद्धाश्रम मे भेजकर. 

मानव समाज कि एक अ-लिखित परम्परा के कारण लडकी ससुराल मे आती है. तो, बहोत बार उनके झगडे होते हुये दिखते है. आय. ए. एस. अफसरोंको हमने सास बहू के झगडे मे आत्महत्या करते हुये देखा है. कई बार कुछ लोगोको हमने माँ और बीबी दोनो का कत्ल करके फांसी के तख्ते पर चढते हुये देखा है. किसी किसी किस्से मे बीबी और सास के बीच मे जमाई राजा सास के साथ ही घर बसा लेता है. तो बेटे की माँ को वृद्धाश्रम का सहारा लेना पडा है.

कुछ घटनाओंमे ये पाया गया कि वृद्धाश्रम मे रहने के बावजूद भी किसी महिला को कोई चतुर बंदा ऐसे मोहजाल मे फसाता है. कि आगे चलकर उनके अवैध सम्बंध तैयार हो जाते है. शुरुआती दौर मे महिला का विरोध होता है लेकिन बहुत जल्द वो सरेंडर हो जाती है. 

मानवी समाज मे 'वृद्धासक्ती' नाम कि एक विकृति होति है. जिसमे अनेको बार 'सेवा' कि आड मे इस प्रकार के सम्बंध भी रचानेवाले महाभाग होते है. लेकिन कहीं पर भी यह लोग जबरदस्ती नही करते. वो बडे चालाक होते है. 

बहोत बडे खैराती होस्पिटलोंमे शवोंके साथ भी सम्बंध रचाने वाले विकृत लोग नजर आते है. इस प्रकार की बाते जब हम पढते है, तो हमारे संस्कारोंको धक्का लगता है. और हमे आश्चर्य होता है. 
    
इसके अलावा लम्बी बीमारी या याद रखने कि क्षमता कम हो जाना यह भी कई बार कारण होते है,  

लेकिन कई बार वृद्धाश्रम बुरे होते है ऐसा भी नही. वाकई किसी किसी आश्रम मे रेग्युलर मेडिकल चेक अप, रेग्युलर दवा और नर्सिंग का भी अच्छा काम होता है. 

केवल यह सजा के तौर पर होता है ऐसा नहीं है. कुछ द्म्पत्तिया ऐसी भी मिली कि जिन्हे बच्चे नही हुये. समय के साथ अच्छे रिश्तेदार मर गये. नये दोस्त नही कर पाये. लेकिन अब पैसा है. तो ऐसी दम्पत्ती आ जाती है, वृद्धाश्रम मे. कुछ बुजुर्ग तो हेल्दी होने के बावजूद भी वहाँ आकर रहते है, दूसरे उनसे भी ज्यादा गये गुजरे वृद्धोंकी सेवा करने के लिये.

कई बार केंसर, टी.बी. के जैसे जान लेवा बीमारी से कोई वृद्ध ग्रस्त हो जाता है तो उनका त्याग उनके बेटे बहुयें करती है. ताकि उनकी अच्छी देखभाल हो. किसी किसी केस मे यह भी पाया गया कि लम्बी जानलेवा बीमारी से गुजरते हुये बुजुर्ग अपनी तकलीफ बच्चोंके उपर नही छोडना चाहते इसलिये स्वेच्छा से वृद्धाश्रम मे भरती हो जाते है.

ऐसे ना जाने कितने किस्से सामने आये, कि जो अपने आप मे एक कहाँनी है. उसके बारे मे फिर कभी लिखुंगा.. अब तक के लिये इतना ही.

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