Is my child safe at school..Read it (HINDI) बच्चोंकी सुरक्षितता एक राष्ट्रिय जिम्मेदारी



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Is my child safe at school..Read it (HINDI) बच्चोंकी सुरक्षितता एक राष्ट्रिय जिम्मेदारी

Child Safety in school : A national agenda

बच्चोंकी सुरक्षितता एक राष्ट्रिय जिम्मेदारी
सन दो हजार सोलह मे एक लाख बच्चों के उपर, स्कूलोंमें अत्याचार हुये हैं. यह आंकडा जितना शर्मनाक है, उतनाही भयावह है. ज्यादा से ज्यादा गुनहगार पैंतीस से लेकर पचास कि उम्र के है. और बच्चे औसतन सात साल कि उम्र के. यह मानने की भी जगह है कि सभी मामले पुलीस तक नहीं पहुँचते. नहीं तो यह आंकडा कितना भी बडा हो सकता है.
क्या हो गया है इस देश कि अवाम को... गुरु को पूजनेवाला, पाठशाला को मंदिर माननेवाला, बच्चोंको भगवान के दूत माननेवाला यह समाज आज एकदम वहशी और क्रूर कैसे बन गया? इस समाजमन का हमें कठोरता से परिक्षण करना पडेगा.
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हजारो वर्ष पहले, परिवारिक मूलभूत ग्यान के बाद, और ज्यादा, ग्यान हासिल करने के लिये इंसान ने 'गुरुकुल' कि रचना की. हर एक संस्कृती मे गुरुकुल होते थे, जिसमे बालक अमुक उम्र के बाद अपने गुरु के पास जाकर शिक्षा ग्रहण करता था. जिसमे आध्यात्म, धर्म, समाजशास्त्र, गणित यह विषय सिखाये जाते थे. शिष्य और गुरु यही केवल गुरुकुल मे होते थे. कोई प्युन, दाई स्विपर नहीं होता था. सभी शिष्य स्वावलम्बी हुआ करते थे. यानी अपने कपडे खुद धोना, अपना खाना खुद बनाना ई.
गुरु का दर्जा समाज मे काफी ऊँचा होता था. बच्चे अपने घरोंसे भी ज्यादा महफूज गुरुकुल में होते थे.
यह परम्परा अंग्रेजोने खत्म कर दी. विचार एवं शस्त्रोंसे लैस ब्रिटीश देखते देखते सम्पूर्ण विश्व पर छा गये. अंग्रेजी भाषा से भी ज्यादा उन्नत ग्यान हिंदुस्तानी भाषाओंमें था. लेकिन फिरभी अंग्रेजी भाषा को ग्यान की भाषा माना जाने लगा.  
आठवी शताब्दि से लेकर सत्रहवी शताब्दि तक सिर्फ हिंदुस्तानी ही नही हर एक संस्कृति में जानलेवा और बुरी प्रथायें थी. और तथाकथित संस्कृति रक्षकोने उन बुरी प्रथाओंका समर्थन किया था. धर्म के नाम पर समाज बट गया था, जाति व्यवस्था सख्त हो गयी थी. यह मानसिकता भारतिय उपखण्ड, आफ्रिका एवम युरोप के कुछ देशोंमें थी. इसका सटिक फायदा ब्रिटिश शासकोने उठाया.
इससे पहले, राजा (शासक) सामाजिक नियम रुढी एवं परम्परा मे ज्यादा दखल अंदाजी नहीं करते थे. लेकिन ब्रिटिशोने अपने शासन काल मे बहोत बुरी प्रथा एवं इंसानियत के खिलाफ के रूढियोंको कानून बनाकर सख्ती से खत्म किया. इसके बावजूद ब्रिटिश लोगोंकी अपनी एक धरोहर थी. अपनी एक विशाल संस्कृति थी. इसलिये उन्होने हिंदुस्थानी सस्कृति मे बुनियादि बदलाव नही किये.
तो फिर कहाँ से गडबडियाँ शुरू हो गयी? समाज हवसखोर और संवेदनशून्य कैसे बन गया?
यह सब कुछ शुरू हुआ पहले और दूसरे विश्व महायुद्ध के दरमियान और उसके बाद. इस कालावधी के दरमियान पूरे विश्व से बुद्धिवादी लोग अपने अपने देश को छोडकर  'अमरिका' नाम कि भूमी पर आ गये. क्योंकि युद्ध के कारण जान और माल कि सुरक्षितता और व्यक्ति एवं विचार स्वातंत्र्य संकुचित हो गये थे. अपनी अपनी महत्वाकांक्षा हर किसी मे जागृत हो गयी थी. इच्छाओंको मूर्त रूप देनेवाली सरजमीं अब अमरिका बन गयी. इसीलिये इसे 'लेण्ड ऑफ अपोर्चुनिटी' कहा जाने लगा. क्योंकि यहाँ कोई सांस्कृतिक कडक नियम नही थे. सरकार के नियम सख्त नही थे. यहाँ कोई भगवान से नही डरता था.
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यहाँ एक ही भगवान था, पैसा. और एक ही धर्म था, 'भोगवाद'. इसीलिये यहाँ एक पेरलल अर्थव्यवस्था, 'अंडरवर्ल्ड' के रूप मे भी कार्यरत थी. संघटित गुनहगारी का वो दौर था. उसी दौर मे सम्पूर्ण विश्व को अमेरिका ने टी.वी. के शोध से चौका दिया. फिर कम्प्युटर और बाद में नेट की खोजोने समूचे मानव जाती के धार्मिक एवम सामाजिक मूल्योंको ध्वस्त कर दिया.   
दूसरे विश्व महायुद्ध के बाद अमरिका और रशिया दो देश महसत्ता बनकर उभरे. लेकिन रशिया के महान नेता 'मिखाईल गोर्बाचेव्ह' अपने देश के लिये 'पेरेस्त्रोईका' (पुनर्गठन) और 'ग्लास्नोस्त' (वैश्विकीकरण) लेकर आये. जिसके कारण रशिया हिस्सोमे बट गया. समय के साथ अमरिका बलवान होता गया. खास कर सत्तर का दशक और अस्सी के दशकोने पूरे इंसानी समाज का सांस्कृतिक अध:पतन किया. अमरिकन संस्कृति मे मॉडर्न विचारोंवाला उसे कहा जाता था, जो 'दारु' पीता था, जो धर्म के संस्कारोंको ठुकरता था उनका मजाक उडाता था. जो किसी की भी इज्जत नही करता था, अपने माँ बाप या शिक्षक की भी नही! वहाँ स्त्रि-मुक्ति आंदोलन मे बढचढकर हिस्सा लेने वाली औरतोने परिवार कि संकल्पना को ठुकरा दिया परिणाम स्वरूप तलाक की संख्या बढी. बाल कम कर दिये और साथ साथ मे कपडे भी. कामोत्तेजक परिवेश को मोडर्न समझा जाने लगा. सुंदर दिखने कि जगह महिलायें अपने आप को उत्तेजक मेकअप से सजाने लगी. दरमियान गर्भ निरोधक गोलियाँ और अन्य साधनोंका शोध लगा जिससे अमरिकन समाज भोगवाद मे आकण्ठ डूब गया.
फिल्मोंमे मनोरंजक कथाओंकी जगह एक्शन यानी बेवजह 'हिंसा' ने ली. धीरे धीरे प्रेम कि जगह हवस ने ली. एक फिल्म के हिट होते ही दूसरी... तीसरी फिल्म और ज्यादा नीचले स्तर पे जाने लगी. लेकिन अब तक भारत मे भी यह फिल्मे बडे पर्दे तक ही सीमित थी. तो सांस्कृतिक नुकसान ज्यादा नहीं हो रहा था. थोडा बहोत मनोरंजन उपलब्ध था टी.वी. के माध्यम से. लेकिन टी.वी. पर बहोत ज्यादा कडक निर्बंध थे. और अचानक वी.सी.आर. की खोज हुयी और अमरिकन लोगोंके हाथ मे पोर्नोग्राफिक अश्लिल फिल्मोंका बडा मार्केट आ गया. आज भी 95% पोर्न फिल्मे अमरिका से ही आते है.
यह विश्लेषण हम क्यो कर रहे है? भारतिय स्कूलोंके अपराध और अमरिकन भोगवाद का क्या कनेक्शन? क्या हम विषय से भटक गये है? जी नही..एक विशाल सांस्कृतिक परिवर्तन या अध:पतन का हम विश्लेषण कर रहे है.
करीबन 1970 के बाद मध्यम वर्ग को अमरिका, जैसे स्वर्ग लगने लगा. हमने और समूचे विश्व ने अमेरिकन संगीत, उनके कपडे पहनने का स्टाईल, बालोंका स्टाईल हूबहू नकल करना शुरु किया. हिंदुस्तानी संगीत की जगह पॉप, जॅझ, डिस्को म्युजिक ने ली. धोती और पतलून की जगह बेल बॉटम आ गयी. बाल काटने के बजाय 'हिप्पी' स्टाईल आ गयी. मिथुन दा कि 'डिस्को डांसर' से लेकर बच्चन साहब की कोई भी सत्तर या अस्सी कि दशक कि फिल्म देखिये और उस वक्त के समाज को याद किजिये.
अब हमने भी हमारे पिताजी को 'डेडी' माताजी को 'ममी' कहना शुरू किया. बडोंके सामने सिगरेट का धुआँ निकालनेवाला मोडर्न समझा जाने लगा. माता पिता की इज्जत ना करना, स्कूल के मास्टर का मजाक उडाना, स्कूलोंके हॉल किराये पर लेकर शादि कराना इत्यादि शुरू हुआ. स्कूलोंका मंदिर जैसा पावित्र्य हमने खतम किया.
'मास्टरजी' शब्द, जिसकी बडी इज्जत थी, अब पर्याय वाचक शब्द बन गया कम आत्मविश्वास वाला, जरूरत से ज्यादा भोला, जिसे दुनियादारी का कोई ग्यान नही, जो कायर है, जिसका शरीर कमजोर है और ऐसा ही कुछ.
महात्मा गांधीजी के स्वातंत्र्य संग्राम के बाद स्वतंत्र भारत में स्कूल कोलेजो मे भारतिय सांस्कृतिक मूल्य बचे थे. 1980 तक सरकारी स्कूल्स और महाविद्यालयोंमे अध्यापन का काम करनेवाली ऐसी पीढी मौजूद थी जो कम पगार होने के बावजूद भी विद्यार्थियोंको ग्यान प्रदान कर रही थी.
लेकिन अस्सी के दशक में अमीर इण्ड्स्ट्रियालिस्ट, तत्कालिन राजनेता और बडे किसानोंके (जो जमींदार थे) बच्चे अमरिका जाकर उच्च शिक्षा लेकर आये. उन्होने शिक्षा के क्षेत्र में 'बिजनस' कि 'अपोर्चुनिटी' देखी. विदेशी शिक्षा प्राप्त इन लोगोने भारतिय शिक्षा क्षेत्र को व्यापार बना दिया. बजाय इसके की शिक्षा का स्तर बढे, उन्होने बाहरी दिखावे पे जोर देना शुरु किया. नब्बे के दशक में सेवा करनेवाली, बेहतरीन तालीम देनेवाली सरकारी स्कूलों के उपर अब नये स्कूलोंका मोडर्न "फर्निचर" और "लुक" हावी हो गये. जिसके उपर मध्यम वर्गीय 'पेरेण्ट्स' फिदा हो गये. और अमरिकी समाज के दोष अब हमारी शिक्षा प्रणाली मे आ गये.
पहला दोष, सिर्फ पैसेवाले लोग ही अब इन स्कूलोंमे जा सकते थे. क्योंकी स्कूल के कपडे, शूज और अदर एक्टिविटीज के लिये बहोत बहोत ज्यादा पैसा वसूलने का काम होने लगा. दूसरा दोष, कई स्कूलोंमें लडकियोंके कपडोंका साईज नीचे से कम कर दिया गया. तीसरा दोष, अनचाहा स्टाफ बढ गया. कहाँ वो हमारी भारतिय संस्कृती जिसमे गुरुकुल मे बच्चे स्वावलम्बी थे, और कहाँ आ गये है हम, जिसमें 'ब्लेक मनी व्हाईट' करने के लिये अनचाहा गुणवत्ताहीन स्टाफ भरती कर दिया. क्योंकि कई स्कूलोंमे 'घोस्ट स्टाफ' मौजूद है. यानी जो लोग मौजूद नहीं है, उनके नाम कि पगार कागज पर दिखाई जाती है. इसके साथ ही कई बार स्टाफ को कम पगार देकर ज्यादा के वाउचर पर साईन कराये जाते है.
इन सभी फ्रंचायजी स्कूल्स की कमिटी देखिये, बाप, बेटा, बहू, साला, जीजा ऐसे लोग मिलेंगे. जिनका शिक्षा क्षेत्र से कोई सम्बंध नहीं होता है. एक प्रायवेट बिजनस के जैसा, स्कूल को भी चलाया जा रहा है.

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अब स्कूलोंमे मुनाफाखोरी बढने लगी. मुनाफा बढाने कि चक्कर मे कम पगार वाला टीचिंग और नोन- टीचिंग स्टाफ रखने पर जोर दिया जाने लगा. यहीं से एक भयंकर गडबडी शुरू हो गयी.
कम पगार देने की चक्कर में हर एक जगह पर कोंट्रेक्ट सिस्टम शुरू हो गयी. टीचर कोंट्रेक्ट पर, माली कोंट्रेक्ट पर, ड्राईवर कोंट्रेक्ट पर, प्यून कोंट्रेक्ट पर. कोंट्रेक्ट पर होने कि वजह से किसी को स्कूल के प्रती या बच्चोंके प्रति आस्था प्रेम सद्भावना नहीं बची. अब इस सिस्टम मे धीरे से मानसिक विकृत लोग कब घुस गये हमें पता ही नही चला.
वो विकृतता उनमें पैदा हो गयी "पोर्नोग्राफिक एडिक्शन" से, क्योंकि हर किसी के हाथ में अब स्मार्ट फोन आ गया. कुछ कम्पनियोने डेटा फ्री कर दिया. तो अब जिन्हे समझ नहीं आ रहा ऐसे बच्चे भी पोर्नोग्राफी देख रहे है, जिनकी उम्र हो गयी ऐसे बुजुर्ग भी इसमे लिप्त है और हर कोई इस तकनिकी बदलाव के तूफान में बहता चला जा रहा है.
"पोर्नोग्राफिक एडिक्शन" मतलब क्या है? "पोर्नोग्राफिक एडिक्शन" मतलब जैसे सिगरेट,शराब कि लत लग जाती है वैसे पोर्न देखे बिना कुछ लोगोंको चैन ही नही आता. अगर नेट्वर्क चला गया तो वो पागल हो जाते है. इसमे सिर्फ पुरुष शामिल है ऐसी बात नहीं है, विवाहित स्त्रिया, कुँवारी लडकियाँ भी "पोर्नोग्राफिक एडिक्शन" के शिकार है.
पोर्न बेचने के लिये उन्हे ज्यादा से ज्यादा विकृत बनाया जाता है. नोर्मल पुरुष और स्त्री की जगह गे, लेस्बियन, बच्चे, प्राणी इनके साथ की अश्लील विडिओ दिखाई जाती है. इससे आगे हिंसा की परीसीमा शुरु हो जाती है. जिसमे एक्चुअल रेप, गृप रेप, "सेडिस्टिक" मतलब दूसरे व्यक्ती को बांधकर उसका रक्त निकालना, उसे पीटना, उसके उपर पेशाब करना या और ज्यादा गंदगी करना इत्यादि दिखाया जाता है. अंत मे तो कुछ जगहोंपर किसी व्यक्ति कि हत्या करके उसके डेड बोडी के साथ अश्लिल हरकते दिखाई जाती है.... कितने सारे वाचकोंका सर, यह पढते पढते ही चकराने लग गया होगा. क्योंकि हम मध्यम परिवार के लोग है और हम "सोच भी नहीं सकते" कि इस दुनिया में ऐसा भी होता है.
बच्चोंके साथ के इन अपराधीयोंकी मानसिकता का अध्ययन बता रहे हैं, कि ये वहशी दरिंदे काम कैसे करते हैं? जो इंसान विकृत पोर्न को बार बार देखता है, उसका दिमाग वैसा ही 'विज्युअलाइजेशन' करता है और अपनी बुद्धी के उपर का कंट्रोल वो खो देता है. अब उसे धर्म, भगवान, नैतिकता कोई भी चीज नही डरा सकती. चाहे कुछ भी हो जाय वो अपनी वासनाओंको अपने तरीके से अंजाम देना चाहता है. और एक दिन वो अपने सचमुच होश खो देता है, और अपराध करता है.
लेकिन ये अपराधी बहोत डरपोक होते है, इसलिये ये छोटे बच्चोंको चुनते है. बहोत दिन तक ये अपराध नही करते सिर्फ अपने मन में किसी "सोफ्ट टार्गेट" शिकार को चुनकर रखते है. यह अपराधी स्कूल या कोलेज में लोअर केटेगरी स्टाफ के तौर पर भर्ती हो जाते है. उन्हे कितने कम पगार की नौकरी मिल रही है उसकी कोई परवाह नही होती. उनका मकसद तो कुछ अलग ही होता है. दूसरा पहलू, कम पगार कि डिमांड करनेवाला शक्स देखकर 'ट्रस्टी' या 'मेनेजमेंट' के मूँह में पानी आ जाता है, क्योंकी वो तो व्यापारी है. सामनेवाले की विकृतता से उसे क्या लेना देना?
दूसरी जगह पर, पहले से जो स्कूल्स के साथ जुडे हुये है उनके अंदर "पोर्नोग्राफी" से विकृती पैदा हो जाती है. हमारे बच्चोंको हमने सीख दी है, कि उमर मे बडे लोगोंको हम अंकल कहे और टीचिंग या नोन टीचिंग स्टाफ जैसे बोलते है वैसा हमने करना चाहिये. बस इसी का फायदा यह अपराधिक मनोवृत्तिवाला शख्स उठाता है.  
जब से मोबाईल फोन में केमरा आ गये हैं तब से कोई भी गंदी चीज कोई भी बंदा कहीं भी आसानी से रेकोर्ड कर सकता है. मोबाईल में पोर्न आसानी से खुलता है तो कही पर भी बैठकर उसे देख सकते है. और पोर्न ने ही समाज को बिगाड कर रखा है.
एक केंद्रिय मंत्रीजी ने निवेदन दिया था कि हम नेट कि ताकद के सामने हतबल है...क्या सचमुच हम नेट की ताकत के सामने हतबल है? क्या केंद्र सरकार ने चाहा तो ये सभी पोर्न साईट्स नहीं बंद हो सकती? जरूर बंद हो सकती है! चीन में तो गूगल भी नहीं है. उनका अपना सर्च इंजीन है. पोर्न वेब साईट्स को ब्लोक करना जरा भी मुश्किल नही है. किसी भी 'एथिकल हेकिंग' एजंसी को यह काम सौंप दिया जाय तो चौबीस घंटे के अंदर ये सभी वेबसाईट्स बंद हो सकती है. या हमारे सायबर क्राईम डिपार्ट्मेंट की एक और शाखा डेवलप करके उन्हें ये काम सौंपा जाय. तो भी इस प्रकार कि वेबसाईट्स बंद हो जायेगी.
एक और अहम मुद्दा. अगर भारत देश में कहीं पर भी रेल दुर्घटना हो जाती है तो नैतिकता के आधार पर रेल मंत्री को इस्तिफा देना पडता है. उसी प्रकार से किसी भी स्कूल में बच्चोंके साथ कोई अप्रिय घटना होती है तो स्कूल के मेंनेजमेंट के पदधिकारियोंपे केस दर्ज किया जाय. क्योंकी बहोत सारे मामले में ये देखा गया है, कि पेरेण्ट्स तुरंत पुलीस के पास नही जाते. उस स्टाफ कि कम्प्लेंट प्रिंसिपल या किसी ट्रस्टी को की जाती है. तो प्रिंसिपल या ट्रस्टी का रवैय्या उस स्टाफ मेम्बर को बचाने का होता है. और जैसे तैसे मामला दबाने की चक्कर में हर कोई रहता है. अगर मेनेजमेंट को हमने जिम्मेदार ठहराने का काम शुरु किया तो अब मेंनेजमेंट खुद ही ऐसे अपराधिक स्टाफ को पुलीस के हवाले करेगी. इसके लिये केंद्र सरकार ने सख्त कानून बनाना जरूरी है, और उसे सख्ती से अमल मे लाना जरूरी है.
क्या होता है... जब एक मासूम पर किसी प्रकार का अत्याचार होता है? या अत्याचार का प्रयत्न होता है? वह लडका या लडकी अंतर्मन के लेवल पर पूरी तरीके से ध्वस्त हो जाते है. अलग अलग प्रकार के भयगण्ड से आगे चलकर ग्रस्त हो जाते है. कुछ सालोंके बाद वो डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं. क्योंकि डिप्रेशन के मरीज की लाईफ हिस्टरी को जब जाना जाता है तो उसके जीवन में कभी ना कभी इस प्रकार का बुरा हादसा हुआ होता है. और अमुक साल के बाद वह हादसा जब मन की उपरी सतह तक आता है तब उसे भुलाने कि चक्कर मे मरीज डिप्रेशन का शिकार हो जाता है.
लडकी अगर है तो जिंदगी भर वो पुरुषोंसे नफरत करती है. यहाँ तक कि अपने पिता या अपने पति से भी. अगर लडके का शोषण हुआ है तो वो जिंदगी भर अपनी माँ, बहन, या पत्नी से असहजता महसूस करता रहता है. जिसके कारण कई बार वो क्रूर बन जाता है.
क्या एक बलात्कारी की मानसिकता हम अपने परिवार में ही तो नहीं तैयार कर रहे है? इसका जवाब है हाँ. हम अपने मोडर्न परिवार मे अपने बच्चोंको भविष्य के 'शायद' बलात्कारी बना रहे है.

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बदलते हुए हिंदुस्तान में एक बडा परिवर्तन आ रहा है, कि हमारी गाँव मे रहनेवाली आबादी का बहोत तेजी के साथ मे शहरी करण हो रहा है. उदाहरण के तौर पर, एक सामान्य परिवार कि हम बात करेंगे जिसमें एक लडका और एक लडकी ऐसी दो संताने हैं. लडकी की उमर दस साल की और लडके की उमर बारह साल की. लडका स्कूल से आया तो उसने बस्ता कोने में फेंक दिया. जूते कोने में फेंक दिये. और ओर्डर की, 'मम्मी नास्ता लाओ'.. मम्मी अब उसकी नौकर बन जाती है. बचपन से हमने उसे अपना स्वावलम्बन सिखाया ही नही. जैसा बेटा पैदा हुआ, उसकी खुद कि मम्मी उसकी सेवा चाकरि मे लग जाती है. बेटे को कभी अपने काम खुद करने चाहिये इसका एहसास दिलाया ही नही. उसे घर के काम सिखाये ही नही. उसके बाप ने भी कभी अपने पत्नी का हाथ घरेलू कामों में बटाया ही नही. टी.वी. पे प्रोग्राम बेटे के इच्छा के अनुसार चलाने की आदत माँ ने लगाई.
इससे विपरीत लडकी को माँ ने स्कूल से आते ही तुरंत किचन मे बुलाया, उसे ट्रेंड किया, अनेक काम एक साथ करने के लिये. वो रोटी भी बेलेगी, सब्जी चूल्हे पे चढायेगी, फोने पे बात भी करेगी. और हमारे बेटे को हमने निकम्मा बनाया उसे कुछ जिम्मेदारी दी ही नही. घर-गृहस्थी चलाने के लिये क्या सामान लगते है, पैसे का हिसाब कैसे रखा जाता है, इसका उसे कोई ट्रेनिंग नही दिया. शाम के सात बजे तक लडकी को हमने घर मे ट्रेनिंग दिया लेकिन लडके को बाहर भगाया. और बताया भी कि खाना तैय्यार होने तक मत आ. क्योंकि उसी वक्त मम्मी का फेवरीट सिरियल टी.वी. पे आनी होती है.
अब ये लडका बाहर जाकर क्या करेगा? तो अपने दोस्तोंके साथ किसी पान के ठेले पर अड्डा जमायेगा और दोस्तोंसे लडकियोंकि अश्लिल बाते करेगा. करते करते वो धीरे धीरे पान, मावा, गुटखा इत्यादि का शिकार हो जाता है. क्योकी पान के ठेलेवाला मुफ्त में तो अड्डा जमाने देगा नही. और घर मे कहा गया है, देर तक मत आ.
अब लडका अगर फेल हो गया, और रोने लगा तो माता पिता बोलेंगे, 'लडकियोंके के जैसा क्योँ रो रहा है? तू मर्द है'. अब लडके को समझ में नही आता ये 'मर्द' क्या चीज होती है? लडकियोंको आसूँ बहाने का परमिशन दिया जा रहा है, जिसकी बदौलत वें मन का बोझ हला कर पाती है. लेकिन लडके को बडी तकलीफ होती है. क्योंकि उसकी भावनाओंको किसी ने समझा ही नही. इसी दरमियाँन किसी गलत लडकी के सम्पर्क में आया, या शराबी दोस्तोंके संगत में आ गया तो अब उसे परिवार से ज्यादा वो लडकी या अपने दोस्त ज्यादा प्यारे हो जाते है. लडकोंको हमने घर मे 'मल्टी टास्किंग ' नहीं सिखाई. पारिवारिक जिम्मेदारियाँ नहीं सौपी. जिसकी वजह से अब वो अंदर ही अंदर घुटने लगता है. और एक दिन किसी कमजोर बालक बालिका या महिला को देखकर उसके उपर हावी हो जाता है. और जिंदगी भर के लिये किसी का जीवन ध्वस्त कर देता है.
लेकिन क्या सिर्फ पुरुष ही कामज्वर से पीडीत है? तो इसका जवाब है, नहीं! आंकडे बताते हैं कि महिलायें जब चालीस के उमर को पार कर देती है, तो अब वो पती को छोडकर किसी और दोस्त कि तलाश में निकलने की सम्भावना रहती है. यहाँ तक कि नानी या दादी बनने के बाद महिलायें अन्य पुरुष के साथ सावधानतापूर्वक आगे बढती है.
इसके पारिवारीक और मानसिक क्या कारण है उसे हम जानेंगे. कोई भी लडकी अपने स्कूल कोलेज मे कितनी भी टेलेंटेड क्यों न हो, कितने भी बडी पोस्ट पे क्यों न हो, वो सबसे पहले माँ रहती है.
आजसे तीस चालीस साल पहले कि समाज रचना को देखें तो बच्चे जब तक छह सात साल के नहीं हो जाते थे तब तक उनका दाखिला स्कूल में नहीं होता था. मतलब वो इतने बडे हो जाते थे कि अपने आप स्कूल जा सकते थे. लेकिन समय ने करवट बदली और अढाई तीन साल के बच्चों को स्कूल भेजना अनिवार्य हो गया. अब मोडर्न माँ के उपर बच्चे की एक और जिम्मेदारी आ गयी, बच्चे को स्कूल या स्कूल बस तक ले जाना और लेकर आना. माँ का यह काम जारी रहता है, जबतक बच्चा चौथी कक्षा तक नहीं जाय. शाम को माँ बच्चे को खुद पढाती है. तो और एक काम बढ जाता है. फ़िर पांचवी कक्षा के बाद माँ को बच्चे का सिलेबस समझ में नही आता तो अब उसे पढाने का काम बंद हो जाता है. स्कूल से आना जाना बच्चा खुद करता है. तो अब माँ का एक और काम बंद हो जाता है. नववी कक्षा तक बच्चा माँ से स्वतंत्र हो जाता है.
तब तक शादी को सोलह सत्रह साल हो जाते है. सास-ससुर या बुजुर्ग या तो समय के साथ मर जाते है या बहोत बूढे हो जाते हैं. इसलिये परिवार में उस 'नई बहू को परेशान करनेवाले लोग' इस वक्त उसके मोहताज हो जाते है. कई बार पति कि आमदनी बढ जाती है, गाँव कि जमीन बिक जाती है. या परिवारिक सम्पत्ती के बँटवारे हो जाते है. किसी भी कारण से या, माता पिता, सास ससूर के इंनवेस्ट्मेंट के रिटर्न्स आ जाते है तो कैसे भी करके उसका अपना घर हो जाता है. फिर घर को सजाने में और दो साल गृहीणी मशगुल हो जाती है.
इसके बाद करने के लिये कुछ बचता ही नहीं. पढी लिखी होने के बावजूद भी सम्पूर्ण समय एवं जीवन परिवार के लिये उसने समर्पित किया. अब वो चाहती है, कि उसकी सराहना हो. पति से, बच्चोंसे वो अपेक्षा रखती है... लेकिन इस समय तक हर कोई अपने अपने जीवन मे इतना व्यस्त हो जाता है, कि इस गृहिणी कि तरफ आती है तो सिर्फ उपेक्षा! अंदर ही अंदर उसे घुटन होने का काम शुरू होता है. सम्पूर्ण जीवन समर्पण का इनाम मिला तो... खाली जिंदगी. अब वो उदास हो जाती है. रिश्तेदारोंको भी अब तक वो समझ जाती है, कि ये सम्बंध भी एक धकोसला है, हर कोई अपने मतलब का है.
फिर वो एक दोस्त कि तलाश में होती है. और सोशल मिडिआ,(फेसबुक या वाट्सप) पे ऐसे मे कोई उसकी तारीफ करनेवाला मिल जाता है. और दोस्ती के नाम से शुरू ये रिश्ता अति मधुर सम्बंधो तक पहुच जाता है. ऐसे मामलों में बडी चतुराई के साथ लोग पेश आते है. क्योंकि अक्सर दोनो प्रेमी अपने अपने परिवार की जिम्मेदारियोंको सँम्भाले हुये होते है. कोई तलाक लेना नही चाहता. लेकिन उस महिला या उनके प्रेमी सज्जन के लिये ये एक नया एड्वेंचर मिलता है. कई बार ऐसे मामले पति या पत्नी को मालूम होने के बावजूद भी 'बच्चोंके खातिर' एक छत के नीचे रहते हैं.
यौवन कि दहलीज पर जो लडकी या लडका डरे हुये से शर्मिले से होते है, वो अब खिलाडी बन चुके होते हैं. चालीस कि उम्र तक वो किसी ना किसी नजदीकी व्यक्ति की मौत को देख लेते हैं. जिसके कारण अब ये विचार मन में आने लगते है, कि जिंदगी और मौत का क्या भरोसा, जितने शरीर के भोग है प्राप्त किये जाय.
इस मानसिकता को भडकाने काम करता है, पोर्न.
भारतिय संस्कृति कि रचना जिन्होने कि उन महान विचारवंतोने वासना भडकानेवाले विचार, दृष्य, शब्दोंको हमारी संस्कृति से हद्द्पार किया था. लेकिन "नेटिजन" कि नयी भोगविलासी संस्कृतिने समाज को मोडन बनाने कि चक्कर मे वासनाओंके दृष्योंसे "पोर्न" से खोखला कर दिया.  
जो अबतक गुप्त था वो सबकुछ इस कदर समाज के सामने फैल गया है, कि एक सैलाब सा उठा है, जिसमे हमारे मासूम बहके जा रहे है. इसे रोकना है तो जल्द से जल्द केंद्र सरकार ने पोर्नोग्रफिक वेब साईट्स को तुरंत बंद कर देना चाहिये. और नियम का उल्लंघन करनेवालोंपर सख्त से सख्त कारवाही होनी चाहिये. तभी स्कूलोंमे हमारे बच्चे सुरक्षित रहेंगे.          
    
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