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literacy policy in India हमारे देश से निरक्षरता को सरकार निरंतर मिटा रही है।


literacy policy in India




हमारे देश से निरक्षरता को सरकार निरंतर मिटा रही है। परन्तु विचार यह करना है कि हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली कैसी है और वह किस प्रकार के जीवन का निर्माण कर रही है तथा शिक्षा वास्तव में कैसी होनी चाहिए।
आज की हमारी शिक्षा व्यवस्था वास्तव में ऐसी शिक्षा-दीक्षा का विधान करना होगा जो हमें स्वयं अपने ऊपर विजय प्राप्त कर सकने में समर्थ बना सके। ज्ञान का अन्तिम लक्ष्य सुंदर चरित्र का निर्माण होना चाहिये।
    विविधताओंसे भरे भारत देश के जनतंत्र को सफल बनाने के लिए प्रत्येक बालक को सच्चा, ईमानदार तथा अच्छा नागिरक बनाना परम आवश्यक है | अत: शिक्षा का परम उद्देश्य बालक को जनतांत्रिक नागरिकता की शिक्षा देना है | इसके लिए बालकों को स्वतंत्र तथा स्पष्ट रूप से चिन्तन करने एवं निर्णय लेने को योग्यता का विकास हो, जिससे वे नागरिक के रूप में देश की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक सभी प्रकार की समस्याओं पर स्वतंत्रतापूर्वक चिन्तन और मनन करके अपना निजी निर्माण लेते हुए जीवन व्यतित कर सकें ।  संकुशल जीवन-यापन कला की दीक्षा यह शिक्षा का दूसरा उद्देश्य बालक को समाज में रहने एवं सकारात्मक समाज निर्माण के कार्य मे मदद करेगा | एकांत में रहकर न तो व्यक्ति जीवन-यापन कर सकता है और न ही पूर्णत: विकसित हो सकता है | उसके स्वयं के विकास तथा समाज के कल्याण के लिए यह आवश्यक है कि वह सहअस्तित्व की आवश्यकता को समझते हुए व्यवहारिक अनुभवों द्वारा सहयोग के महत्व का मूल्यांकन करना सीखे | इस दृष्टि में अनुशासन तथा देशभक्ति चेतना आदि अनेक सामाजिक गुणों का विकास होना चाहिये जिससे प्रत्येक बालक इस विशाल देश के विभिन्न जाति धर्म प्रदेश भाषिक वैविध्यताओंके साथ प्रत्येक व्यक्ति का आदर करते हुए समाज मे साथ घुलमिल कर रहना सीख जायें ।
बालकों में व्यवसायिक कुशलता की उन्नति यह शिक्षा का तीसरा उद्देश्य है | इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लये तांत्रग्यानिक एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण की आवश्यकता शुरु से ही है | अत: बालकों के मन में श्रम के प्रति आदर तथा रूचि उत्पन्न करना एवं हस्तकला के कार्य पर बल देना परम आवश्यक है | यही नहीं, पाठ्यक्रम में विभिन्न व्यवसायों का भी उचित स्थान समझाना चाहिये । जिससे प्रत्येक बालक अपनी रूचि के अनुसार उन व्यवसायों को चुन सकें जिसे शिक्षा समाप्त करने के पश्चात वो अपने जीवन का लक्ष्य बनाना चाहता हो । पढाई का एक धेय्य, जीवन कालक्रमणा के लिये सम्पत्ती का निर्माण भी है। सम्पत्ति का निर्माण करते हुये समाज मान्य संसाधन एवम देश हित से उसे अंजाम दिया जाय यह हेतु शिक्षा का होना ही चाहिये। जिसके कारण आगे चलकर अलगाव वादि विचारधारा प्रकट ना हो। देश मे भाईचारा एकता बने रहे इसी उद्देश से पाठ्यक्रमोंकी रचना होना जरूरी है। सद्य स्थिति के पाठोंके उपर और ज्यादा संशोधन कि आवश्यकता है।  

 बालक के व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास शिक्षा का चौथा उद्देश्य है | व्यक्ति विकास का तात्पर्य बालक के बौद्धिक विकास, शारीरिक, सामाजिक तथा व्यवसायिक विकास आदि सभी पक्षों एवं रचनात्मक शक्तियों के विकास से है | इस उद्देश्य के अनुसार बालकों को क्रियात्मक तथा रचनात्मक कार्यों को करने के लिए प्रेरित करना है। साहित्यिक, कलात्मक एवं सांस्कृतिक आदि अनेक प्रकार की रुचियों का निर्माण हो जाये तथा आधुनिक शास्त्रो के प्रति रुचि निर्माण करने के लिये विशेष प्रयत्न होना जरूरी है।
प्रसार माध्यमोंसे भी ज्यादा समाज-माध्यमोंका आनेवाली पीढियोंपर सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनो असर नजर आ रहा है। नये बालकोंकि पीढी नेट, मोबाईल, टी.वी के मायाजाल मे फसती हुयी नजर आ रही है। जिसके गुण दोषों की चर्चा पाठ्यपुस्तकोंमे होना जरूरी है। क्योंकि तेजी से बदलनेवाले समाज को निश्चित दिशा कोई दिखायेगा तो वो हमारी विशाल शिक्षा प्रणालि है।

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