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Das-mahavidya दस महाविद्या - साधना उपासना

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दस महाविद्या - साधना उपासना


आदि शक्ति के अपरम्पार रुप है। दस महाविद्या असल मे एक ही आदि शक्ति के अवतार है। वो क्रोध मे काली, सम्हारक क्रोध मे तारा और शिघ्र कोपि मे धूमवती का रुप धारण कर लेती है। दयाभाव मे प्रेम और पोषण मे वो भुवनेश्वरी, मतंगी और महालक्ष्मी का रुप धारण कर लेती है। शक्ति साधना में कुल दस महाविद्याओं की उपासना होती है। यह सब महाविद्या ज्ञान और शक्ति प्राप्त करने की कामना रखनेवाले उपासक करते है। ध्यान रहे, सिर्फ मंत्रजाप से कुछ नही होता साधक के कर्म भी शुद्ध होने जरुरी है. 

दस महाविद्या को इन नामो से सम्बोधित किया गया है...

1.काली माता,2. तारा माता,3. त्रिपुरसुंदरी माता,4. भुवनेश्वरी माता,5. त्रिपुर भैरवी माता 6. धूमावती माता,7. छिन्नमस्ता माता,8. बगलामुखी माता,9. मातंगी माता,10. कमला माता. इनके दो कुल होते है, एक है, काली कुल और दूसरा श्री कुल। चार साधानाए काली कुल की है और छः साधानाए श्री कुल की होती है।

महाविद्या साधना किसी भी धर्म का किसी भी जाति का साधक या साधिका कर सकते है. जाति, वर्ग, लिंग इस प्रकार के बन्धन दस महाविद्या मे नही होते। सभी महाविद्या मे काल भैरव की उपासना भी की जाती है। क्योकि महाविद्याओ कि क्रियाए जटिल होती है. इसलिए साधना शुरु करने से पहले पंच शुद्धिया करे.

1.स्थान शुद्धि: जहा पर साधना के लिये बैठते है उस जगह को शुद्ध कर लिजिये.पहले जमाने मे लोग गौमाता के गोबर से एवम गौमूत्र से सम्पूर्ण जगह को शुद्ध करते थे. आज मॉडर्न लाईफ स्टाईल मे कम से कम धुला हुआ आसन ले लिजिये. मंगलमय वातावरण के लिये अगरबत्ती जलाइये

2.देह शुद्धि: सात्विक भोजन का सेवन करे, ब्रम्हचर्य का पालन करे. साधना मे बैठने से पहले नहा कर, शौचादि शारिरीक क्रिया से निवृत्त हो जाये, बद्ध कोष्ठता गेसेस कि समस्या साधना मे भयंकर बाधा पैदा कर आपके लिये समस्या पैदा कर सकती है. शरिर जब व्याधी ग्रस्त हो, मतलब जुकाम बुखार इत्यादि तब साधना ना करे.प्राणायाम, योग इत्यादि के प्रयोग से देह शुद्धि मे मदद मिलती है. 

3.द्रव्य शुद्धि: द्रव्य शुद्धि के दो अर्थ है. पाप से कमाया गया धन इसमे इस्तेमाल ना करे. दूसरा, साधना के लिये जिन साधनोंका इस्तेमाल करे उनका स्वच्छ एवम पर्याप्त होना जरूरी है. स्वच्छ जल लेकर मंत्रजाप से गुरू इसे शुद्ध करके देंगे. (एवम पर्याप्त मतलब, टूटा प्याला, फटी चादर, टूटा फ्रेम, फटे नोट, टूटा फर्निचर इनका प्रयोग ना करे.)

4.देव शुद्धि: सिर्फ साधना के ही नही, घर की दूसरी मूर्तिया और तस्वीरोंको भी साफ कर ले 

5.मंत्र शुद्धि: योग्य गुरु के सनिध्य मे दीक्षा ग्रहण कीजिये। दीक्षा के दौरान शक्तिपात योग के द्वारा गुरू आपके अंदर शक्ति स्थान निर्माण करता है. 

साधना की मुद्राएँ न्यास, यंत्र- माला पूजन, प्राण प्रतिष्ठा, पंचोपचार आदि की जानकारी गुरु से ही प्राप्त होगी. 

साधक को अपने गुरु के चरण कमल के पास बैठकर साधना करनी चाहिये 

पंचोपचार, षोडषोपचार अथवा चौसठ उपचारों के द्वारा महाविद्या यंत्र में स्थित देवताओं का पूजन करे. उसमें स्थापित देवताओं की अनुमति प्राप्त कर पूजन कीजिये। तर्पण, हवन कर वेदी को ही देवता मानकर अग्नि रूप में पूजन करे. द्रव्यों को भेंट कर उसे संपूर्ण संतुष्ट करे। 

फिर देवता की आरती कर पुष्प अर्पण करे। गुरु द्वारा कवच-सहस्रनामं स्त्रोत्र का पाठ करके स्वयं को शक्ति के चरणों में समर्पित करे। देवता को अपने मन में याद कर के सामग्रीयो को नदि, तालाब, समुंदर मे समर्पित करने के लिये कहा गया है. लेकिन धरती मा और पर्यावरण का ध्यान रखते हुये सामग्री के उपर जल का छिड्काव करके प्रतिमात्मक विसर्जन की भावना रखकर देवताओंकी माफी मांगते हुये कहीं भी निकास करे. प्रतिकात्मक विसर्जन कि आज्ञा हमारे धर्म शास्त्र देते है. 

माँ कालि

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मा कालि आदि शक्ती का पहला रूप है. कालि मतलब “कालिका”यानी समय कालिका. इसे समय का रूप माना जाता है. समय जो सबसे बलवान होता है. यह देवी हर प्रकार के बुराई काअ सर्वनाश करती है इसलिये उग्र रुप धारिणी है. उसका तांडव शिवजी के तांडव से भी भयावह था. इसलिये उनकी ऊर्जा से कही भूलोक नष्ट ना हो जाय इसलिये शिवजी भूलोक और काली मा के पैरोके बीच मे आकर उनके इस विनाशक शक्ती को खुद झेलते हुये दिखाई देते है. और हमे लगाता है, यह शिवजी के उपर नाच रही है. 

चंड और मुंड इन राक्षसोने मा दुर्गा पर आक्रमण किया था इसलिये वह इतनी क्रोधित हो गयी कि वह समय के आगे जाकर काले रंग कि हो गयी. 

एक बार दरुका नामक राक्षस को मारने के लिये भगवान शिवजी ने माता पार्वती को यह काम सौपा था. क्योंकिभोले नाथ ने स्वयम ही दरूका राक्षस को वरदान दिया था कि तुम्हे सिर्फ औरत से ही भय है. और दरुका को मारने के लिये शिव ने शक्ति की योजना की. 

रक्तबीज नामक राक्षस को भी मारने के लिये मा काली की योजना हुई थी. (जो कि मा दुर्गाका ही रूप है.) उनकी यह पोप्युलर तस्वीर रक्तबीज के सम्हारण के युद्ध के दरमियान की है. 

यह काम रुपिणी है. इन्हे हकीक की माला से मंत्रजाप करकर प्रसन्न किया जाता है। देवि कालि बीमारी को नष्ट करती है. दुष्ट आत्मा के प्रभाव से हमे मुक्त करती है दुष्ट ग्रह स्थिती से हमे बचाती है. अकाल मृत्यु से बचाने की ताकत अगर किसी मे है तो वो स्वयम माँ काली मे है. क्योंकी मा काली से स्वयम मृत्यु भी डरता है. वाक- सिद्धि यानी हम जो बोलेंगे वो ही सत्य हो जाता है. इसलिये माँ काली कि शक्ति को विधिवत प्राप्त करे. 

षट-कर्म के इच्छाधारी साधक के सभी षट-काम दस महाविद्या करती है. जैसे कि मारण, मोहन, वशीकरण, सम्मोहन, उच्चाटन, विदष्ण आदि... 

जिनकी उपजिविका तांत्रिक कर्मोंसे ही होती है वह षट-कर्म करते है, परन्तु बुरे कर्म का अंजाम कभी भी अच्छा नही होता.. समाज, प्रकृति, प्रारब्ध, कानून इसकी सजा देता है. इसलिए अपनी शक्ति से शुभ कार्य कीजिये. किसीका बुरा ना करे. बंगाल, आसाम हिमाचल प्रदेश मे इनके ज्यादा भक्त है. उनकी श्रेणी मे हम भी शामिल हो सकते है. 

मंत्र 
!! ॐ क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं स्वाहा !!

माँ काली स्तुति 
रक्ताsब्धिपोतारूणपद्मसंस्थां पाशांकुशेष्वासशराsसिबाणान्।शूलं कपालं दधतीं कराsब्जै रक्तां त्रिनेत्रां प्रणमामि देवीम् ॥ 

तारा माता

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माँ तारा दस महाविद्या की दूसरी देवी है. इसे “तारिणी” माता भी कहा गया है। तारा माता के शरण मे जो साधक आता है उसका जीवन सफल हो जाता है. तारा माँ “फीडर’ है. मतलब जिसका स्नेहपूर्ण दूध कभी भी कम नही होता. साधक को एक दूध पीते बच्चे की तरह माँ अपनी गोद मे रखती है. उसे वात्सल्य का स्तनपान हररोज कराती है. 

तारा माँ भगवान शिवशंकर की भी माता है. तो तारा मा कि ताकत का अंदाजा लगाइये. जब देव और दानव समुदमंथन कर रहे थे तो विष निर्माण हुआ उस हलाहल से विश्व को बचाने के लिये शिव शंकर सामने आये उन्होने विष प्राषन किया. लेकिन गडबड यह हुई के उनके शरीर का दाह रुकने का नाम नही ले रहा थ. इसलिये मा दूर्गा ने तारा मा का रूप लिया और भगवान शिवजी ने शावक का रूप लिया.फिर तारा देवीउन्हे स्तन से लगाकार उन्हे स्तनोंका दूध पिलाने लगी. उस वात्सल्य पूर्ण स्तंनपान से शिवजी का दाह कम हुआ. लेकिन तारा मा के शरीर पर हलाहल का असर हुआ जिसके कारण वह नीले वर्ण की हो गयी. 

जिस मा ने शिवजी को स्तनपान किया है, वो अगर हमारी भी वात्सल्यसिंधू बन जायेगी तो हमारा जीवन धन्य हो जायेगा. तारा माता भी मा काली जैसे सिर्फ कमर को हाथोंकी माला पहनती है. उसके गले मे भी खोपडियोंकी मुंड माला है. 

वाक सिद्धि, रचनात्मकता, काव्य गुण के लिए शिघ्र मदद करती है. साधक का रक्षण स्वयमं माँ करती है इसलिये वह आपके शत्रूओंको जड से खत्म कर देती है. 

साधना के लिये लाल मूंगा, स्फटिक या काला हकीक की माला का इस्तेमाल करे. 121 की 3 माला करे. 

इनके दो मंत्र है. एक मंत्र मे “त्रिं” और दूसरे मे “स्त्रीं” ऐसे उच्चारण है.शक्ति का यह तारा रूप शुद्दोक्त ऋषि द्वारा शापित है. इसिलिये उच्चारण का ध्यान रहे. 

मंत्र 
“ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट” 

तारा स्तुति 
मातर्तीलसरस्वती प्रणमतां सौभाग्य-सम्पत्प्रदे प्रत्यालीढ –पदस्थिते शवह्यदि स्मेराननाम्भारुदे । 
फुल्लेन्दीवरलोचने त्रिनयने कर्त्रो कपालोत्पले खड्गञ्चादधती त्वमेव शरणं त्वामीश्वरीमाश्रये ॥

त्रिपुर सुंदरी माता

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दस महाशक्ती मे इनका स्थान बहोत उंचे दरज्जे का है. तीनो लोक मे इनसे सुंदार माता का कोई रूप नही है. इसे शोडशी यानी सोलह साल की सुंदर लडकी माना गया है. इस ब्रम्हांड मे ऐसा कोई काम नही है जिसे त्रिपुर सुन्दरी माता नही कर सकती.

भगवान शिवजी ने दक्ष पुत्री सती से विवाह रचाया. जो दक्ष को पसंद नही था. एक दिन राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया. लेकिन उन्हे यह बभुत लगानेवाला फकिर दामाद पसंद ना होने कि वजह से पुत्रि और दामाद को निमंत्रित नही किया गया था. लडकी को लगा पिता शायद भूल गये होंगे इसलिये भग्वान शिव ने मना करने के बावजूद भी वह यज्ञ स्थली पर पहुची.उसे देख दक्ष उपरोधिक कटाक्ष करने लगे. उन शब्दोंको सती सह नही पाई इसलिये उसने सामने वाली आग के हवाले अपने आप को किया. 

यह दुखद समाचार मिलने के बाद शिवजी ने घोर तप करके पार्वती को हिमायत के द्वारा उत्पन्न किया. पार्वती ही आदि शक्ति होने के कारण उनकी फिरसे पत्नी बनी. आगे चलकर कामदेव को शिव पार्वती के जबरदस्ती के काम मिलन के कारण कामदेव को शिवजी ने तीसरी आंख खोलकर भस्म कर दिया. लेकिन विश्व की भलाई के महायज्ञ का आयोजन ब्रम्हा और विष्णू जी करना चाहते थे. उस वक्त कामदेव के भस्मसे कामदेव और उसके पत्नि के रूप मे ललिता त्रिपुर सुंदरी का निर्माण किया गया. त्रिपूर सुंदरी देवी भगवान विष्णू की बहन भी है. 

कामदेव की राख से उत्पन्न होने के कारण यह मिलनोत्सुक जोडे को तुरंत मिला देती है. इसकी उपासनासे गर्भ धारणा भी तुरंत होती है. क्योंकी मनुष्य योनी को आगे ले जाने की जिम्मेदारी उस महायज्ञ के बाद कामदेव और त्रिपुर सुंदरी को दिया गया है. 

त्रिपुर सुन्दरी माता की उपासना स्त्रीयोंको परमोच्च सुख प्रदान करती है. इनकी उपासना से हर इंसान सुंदर परिपक्व और बहोत प्यार करनेवाला आकर्षक व्यक्ति बन जाता है. यह शक्ति और भोग का सुंदर मिलाप है. यह वासनाओंका भोग ( सेक्स ) और मोक्ष दोनो साथ-साथ देने की ताकद रखती है। त्रिपुर सुंदरी माता कि साधना के अलावा दुनिया मे ऐसी कोई साधना नही है जो भोग और मोक्ष दोनो को एक साथ प्रदान करे. 

त्रिपुर सुंदरी माँ को प्रसन्न करने के लिये रुद्राक्ष की माला का आयोजन करे. एक मुखी रुद्राक्ष माँ को ज्यादा पसंदहै. लेकिन एक मुखी नही है तो भी उसकी कृपा मे कमी नही आती. 54 की 8 माला करे. 

मंत्र 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नमः

त्रिपुर सुंदरी माता स्तुति 
उद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां रक्तालिप्तपयोधरां जपपटीं विद्यामभीतिं वरम् । 
हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं देवीं बद्धहिमांशुरत्नमुकुटां वन्दे समन्दस्मिताम् ॥

माता भुवनेश्वरी

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माँ भुवनेश्वरी दस महाविद्या की चौथी देवी है. भुवनेश्वरी मतलब जिनकी सत्ता तीनो लोक पर होती है ऐसी ऐश्वर्य सम्पन्न देवी. साधना हर प्रकार के सुख मे वृद्धि करने वाली होती है. देवी भुवनेश्वरी की खास बात यह है कि यह अत्यंत भोली है. जिसके कारण वह बहुत ही कम समय मे प्रसन्न हो जाती है. लेकिन माता का यह रूप अत्यंत कोपिष्ठ भी है. और किसी कारण से माता रूठ गयी तो मनाने के लिये दो गुनी साधना करनी पडती है. देवी माँ से कभी भी झूठ या स्वार्थ पूर्ण वचन ना करे.

यह शक्ति किसी साधक को प्राप्त हो जाये तो उसके रिश्तेदार, मित्रगण आदि उसके कदमो मे आकर गिरते है. उसकी इज्जत समाज मे बहोत ज्यादा बढ जाती है. मशिनोंके साथ काम करने वाले लोगोंके उपर यह इतनी प्रसन्न हो जाती है कि मा मशीन का रूप धारण कर लेती है, जिसके चलते कभी भी उस मशीनके साथ कोई हादसा एक्सीडंट नही होता. 

दिमाग से काम करनेवाले व्यापारी का दिमाग स्थिर सखने मे माता भुवनेश्वरी मदद करती है. उच्च पद कि परिक्षाओमे सही उत्तर सही समय पर याद दिलाने का काम माता भुवनेश्वरी करती है. इसलिये कलेक्टर, कमिश्नर पदो के लिये परिक्षा देने वाले विद्यार्थी मा भुवनेश्वरी के शरण मे आ जाते है. 

ब्रम्हांड कि निर्मिती के वक्त सूर्य नारायण अकेलेही अपनी शक्ती का प्रदर्शन कर रहे थे इसी को लेकर ब्रम्हा, विष्णू और महेश मे अपने इस निर्माण कार्य को (सूर्य की उत्पत्ती)लेकर शक्ति प्रदर्शन मे बहस छिड गयी. हर किसी का दावा होने लगा कि सर्वशक्तिमान कौन है. इसिलिये आदिशक्ति ने पृथ्वी का रूप लेकर उन तीनोंका गर्व हरण किया. क्योंकी भूमाता सिर्फ शांत थी ऐसे नही उसके गर्भ मे पानी भी था जो सुर्य की शक्ती को शांत कर सकता था. इसिलिये भुवनेश्वरी माता का सीना आधा खुला है,क्योंकी सृष्टी का सर्जन निरंतर हो रहा है उसका भरण पोषण भी निरंतर हो रहा है. इसी कारण मा का सीना बहोत बडा और हमेशा भरा हुआ रहता है. 

जिस स्त्री को दूध कम है, या जिस माता का दूध शिशु के लिये पूरा नही हो रहा है, या जिन स्त्रियोंकी कोक सूनी है, उन्होने, अपने पति के साथ मिलकर मा भुवनेश्वरी की आराधना करनी चाहिये. 

भुवनेश्वरी मा आपको कदापि निराश नही करेगी. 

भुवनेश्वरी माता की आराधना के लिये पानी जैसे स्फटिक की माला का प्रयोग, सफेद धागे मे पिरोकर करे. इनका मंत्रजाप 11 मालाओंसे करे. 

मन्त्र 
“ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नमः”

भुवनेश्वरी स्तुति 
उद्यद्दिनद्युतिमिन्दुकिरीटां तुंगकुचां नयनवययुक्ताम् । स्मेरमुखीं वरदाङ्कुश पाशभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम् ॥

छिन्नमस्ता देवी

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छिन्नमस्ता देवी को छिन्नमस्तिका, प्रचंड चंडिका के नामोंसे भी सम्बोधित किया जाता है. इनसे प्राप्त होनेवाली यह विद्या अति प्रभावशाली है. प्रभाव ज्यादा होने के कारण इसे धारण करना सामान्य साधक के बस की बात नही है. छिन्नमस्ता देवी शत्रू को खदेड खदेड कर मारती है. कई बार तो शत्रू का जबतक सर्व नाश नही होता तब तक मा उसे तडपा तडपाकर हर रोज मार देती है. 

यह देवी जीवन भी देनेवाली है और मौत भी देती है. इनके दरबार मे अपने फैसले वो खुद लेती है. इनकी सत्ता अपरम्पार है. 

रोजगार में सफलता, वशिकरण मे सफलता, नौकरी मे अच्छा बॉस मिलना, पद उन्नती मिलना, कोर्ट कचहरी के केस को अपने फेवर मे लाना आदि काम करने मे माता को बडा मजा आता है. किसी भी व्यक्ती को आपके पक्ष मे करना, कुंडिलीनी शक्ती जागृत करना, औरत या आदमी को तुरंत वश करना ऐसे चमत्कार छिन्नमस्ता देवी के बाये हाथ का खेल है. 

माँ के इस रूप की साधना सावधान होकर करे. क्योकि यह शक्ति अत्यंत तीव्र है. शक्ति के दूसरे रूप अगर चंद्रमा है तो यह रुप सुर्य नारायण है. इतनी इसकी शक्तिया प्रभावशाली है.इनके दरबार मे फटाफट रिजल्ट मिलता है. साधक को लम्बा इंतजार नही करना पडता है. छिन्न्मस्ता माता वस्त्र को धारण नही करती है. सिर्फ मनुष्य खोपडियोंको धारण करती है. 

उसकी सेविकाये अपनी सगी बहने मेखला (डाकिणी) और कनखला (वर्णिणी) भी नग्न है.और उन्हे छिन्नमस्ता देवी अपना रक्त पिला रही है. अपने ही गले को काटकर अपना ही रक्त पीनेवाली यह जबर्दस्त शक्ती है. कितना निडर मन है उसका कि स्वयम का गला स्वयम ही काटकर अपना ही सर एक हाथ मे पकडकर अपना ही भोग ले रही है. यह माता स्थिर या बैठी हुई या खडी नही है. यह माता सतत परिभ्रमण करती है. यही इसकी तकद है लेकिन भक्तो के लिये इसे अपने पास रखना बडा मुष्किल काम होता है. क्योंकी जहा आपकी भक्ति कम हुई के ये चली जायेगी दूसरे भक्त के पास. 

उनके कदमोंके नीचे कामदेव और उनकी पत्नी रति कामक्रिडा करते हुये पाये जाते है. कई बार यह राध-क्रिष्ण की जोडी का रूप लेती है. उनके रती क्रिडा मे स्त्रीपात्र उपर और पुरुष पात्र नीचे है. यह चीज दर्शाती है कि छिन्नमस्ता मा कितनी ताकतवर है. वह अपनेही भक्त को कुचल सकती है. क्योंकि अगर साधक ने साधाना के दरमियान आलस किया और साधना पूरी नही की तो छिन्नमस्ता मा के क्रोध की कोई सीमा नही रहती. उनके पास धन कपडे या किसी चीज का लालच देकर प्रसन्न कराने के अन्य कोई उपाय नही है. क्योंकी इन्होने सभी चीजोंका त्याग किया हुआ है. 

लेकिन जिस साधक को ये प्रसन्न हो जाती है उसे वह अपने सीने से लगाकार अमृत स्तनपान कराती है. फिर चाहे वह दुनिया मे कही भी चली जाय आपको उसकी असीम ममता का दूध मिलता ही रहता है. लेकिन उतना लायक बनने के लिये आपको कडक साधना करनी पडती है.

छिन्न्मस्ता माँ का मंत्रजाप काले हकीक की माला से करे. किसी भी अमावस को उपासना शुरू करे और अगले अमावस तक बिना खंडित किये माला करे. दस बार सोचकर माता की आराधना करे. अगर अमावस से पहले किसी कारण से साधना खंडित हो गयी तो आपका मस्तिष्क छिन्न छिन्न को जायेगा. यानी आप पागल हो सकते है. या आपके प्राण भी वो ले सकती है. या तो साधना शुरू ही ना करे. 

लेकिन जो साधक मन के दृढ निश्चयी है, उन्होने इस साधना की अलौकिक अनुभूति को प्राप्त करना ही चाहिये. मन मे अगर इच्छा है तो इसे अवश्य करे. 

मंत्र 
“श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै हूं हूं फट स्वाहा: 

छिन्नमस्ता देवी स्तुति 
नाभौ शुद्धसरोजवक्त्रविलसद्बांधुकपुष्पारुणं भास्वद्भास्करमणडलं तदुदरे तद्योनिचक्रं महत् । तन्मध्ये विपरीतमैथुनरतप्रद्युम्नसत्कामिनी पृष्ठस्थां तरुणार्ककोटिविलसत्तेज: स्वरुपां भजे ॥ 

माँ त्रिपुर भैरवी

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भैरवी नाम जिस शक्ति के साथ आता है, वहाँ तंत्र विद्याओंका होना अनिवार्य होता है. प्रेत आत्माओंसे सीधा सम्बंध रखने वाली यह माता अत्यंत खतरनाक है. अघोर शैतानी तंत्रिक प्रयोगो के लिए इस मा की सहायता ली जाती है. सुन्दर स्त्री की कामना या धनी पुरुष प्राप्ति के लिए त्रिपुर भैरवी मा की सेवा की जाती है. प्रेम सम्बंध मे विवाह होना, सालो-साल से रुके हुये मंगल कार्य को गती देना, विवाह बंधनके उपरांत प्रेमी को पाना, समाज मे प्रेमके कारण बदनाम ना होना इन सबके लिये मॉ श्री त्रिपुर भैरवी देवी की आराधना की जाती है. इनकी साधना तुरंत प्रभाव दिखाती है. तांत्रिक समस्या का समाधान त्रिपुर भैरवी के पास होता है. समस्या का जड से विनाश त्रिपुर भैरवी देवी करती है। 

देवी कि साधना घोर कर्मों से सम्बंधित कार्यों में की जाती हैं। देवी मनुष्य स्वभाव से वासना, लालच, क्रोध, ईर्ष्या, नशा तथा भ्रम को मुक्त कर योग साधना में सफलता हेतु सहायता करती हैं। समस्त प्रकार के विकारो या दोषो को दूर कर मनुष्य साधना या योग के उच्चतम स्तर तक पहुँच सकता है अन्यथा नहीं। कुण्डलिनी शक्ति जाग्रति हेतु, समस्त प्रकार के मानव दोषो या अष्ट पाशो का विनाश आवश्यक है तथा ये शक्ति देवी त्रिपुर भैरवी द्वारा ही प्राप्त होती हैं। 

यह देवी श्मशान वासिनी है, मानव शव या मृत देह देवी का आसन हैं. देवी मांस तथा रक्त प्रिया है तथा शव पर ही आरूढ़ होती हैं. भगवती त्रिपुर भैरवी, ललित या महा त्रिपुर सुंदरी कि रथ वाहिनी हैं तथा योगिनिओ की अधिष्ठात्री या स्वामिनी के रूप में विराजमान हैं. देवी भैरवी दृढ़ निश्चय का भी प्रतिक है, इन्होंने ही पार्वती के स्वरूप में भगवान शिव को पति रूप में पाने का दृढ़ निश्चय किया था, देवी की तपस्या को देख सम्पूर्ण जगत दंग रहा गया था। देवी के भैरव बटुक हैं तथा भगवान नृसिंह की शक्ति हैं. देवी की भैरवी का नाम काल रात्रि है तथा भैरव काल भैरव. मूंगे की माला पीले धागे मे पिरोकर 21 बार 21 की माला करे. 

मंत्र 
“ॐ ह्रीं भैरवी कलौं ह्रीं स्वाहा:” 

त्रिपुरभैरवी देवी स्तुति 
उद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां रक्तालिप्तपयोधरां जपपटीं विद्यामभीतिं वरम् । हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं देवीं बद्धहिमांशुरत्नमुकुटां वन्दे समन्दस्मिताम् ॥ 

माँ धूमावती

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देवी धूमावती, भगवान शिव के विधवा के रूप में विद्यमान हैं, अपने पति शिव को निगल जाने के कारन देवी विधवा हैं। देवी का भौतिक स्वरूप क्रोध से उत्पन्न दुष्परिणाम तथा पश्चाताप को भी इंगित करती हैं। इन्हें लक्ष्मी जी की ज्येष्ठ, ज्येष्ठा नाम से भी जाना जाता हैं जो स्वयं कई समस्याओं को उत्पन्न करती हैं।

देवी धूमावती का वास्तविक रूप धुऐ जैसा हैं तथा इसी स्वरूप में देवी विद्यमान हैं। शारीरिक स्वरूप से देवी; कुरूप, उबार खाबर या बेढ़ंग शरीर वाली, विचलित स्वाभाव वाली, लंबे कद वाली, तीन नेत्रों से युक्त तथा मैले वस्त्र धारण करने वाली हैं। देवी के दांत तथा नाक लम्बी कुरूप हैं, कान डरावने, लड़खड़ाते हुए हाथ-पैर, स्तन झूलते हुए प्रतीत होती हैं। देवी खुले बालो से युक्त, एक वृद्ध विधवा का रूप धारण की हुई हैं। अपने बायें हाथ में देवी ने सूप तथा दायें हाथ में मानव खोपड़ी से निर्मित खप्पर धारण कर रखा हैं कही कही वो आशीर्वाद भी दे रही हैं। देवी का स्वाभाव अत्यंत अशिष्ट हैं तथा देवी सर्वदा अतृप्त तथा भूखी-प्यासी हैं। देवी काले वर्ण की है तथा इन्होंने सर्पो, रुद्राक्षों को अपने आभूषण स्वरूप धारण कर रखा हैं। देवी श्मशान घाटो में मृत शरीर से निकले हुए स्वेत वस्त्रो को धारण करती हैं तथा श्मशान भूमि में ही निवास करती हैं, समाज से बहिष्कृत हैं। देवी कौवो द्वारा खीचते हुए रथ पर आरूढ़ हैं। देवी का सम्बन्ध पूर्णतः स्वेत वस्तुओं से ही हैं तथा लाल वर्ण से सम्बंधित वस्तुओं का पूर्णतः त्याग करती हैं।

चुकी देवी ने क्रोध वश अपने ही पति को खा लिया, देवी का सम्बन्ध दुर्भाग्य, अपवित्र, बेडौल, कुरूप जैसे नकारात्मक तथ्यों से हैं। देवी श्मशान तथा अंधेरे स्थानों में निवास करने वाली है, समाज से बहिष्कृत है, (देवी से सम्बंधित चित्र घर में नहीं रखना चाहिए) अपवित्र स्थानों पर रहने वाली हैं।देवी का सम्बन्ध पूर्णतः अशुभता तथा नकारात्मक तत्वों से हैं, देवी के आराधना अशुभता तथा नकारात्मक विचारो के निवारण हेतु की जाती हैं। देवी धूमावती की उपासना विपत्ति नाश, रोग निवारण, युद्ध विजय, मारण, उच्चाटन इत्यादि कर्मों में की जाती हैं। देवी के कोप से शोक, कलह, क्षुधा, तृष्णा होते है। देवी प्रसन्न होने पर रोग तथा शोक दोनों विनाश कर देती है और कुपित होने पर समस्त भोग कर रहे कामनाओ का नाश कर देती हैं। आगम ग्रंथो के अनुसार, अभाव, संकट, कलह, रोग इत्यादि को दूर रखने हेतु देवी के आराधना की जाती हैं।धूमावती देवी हर प्रकार की द्ररिद्रता का नाश करती है. तंत्र – मंत्र को अंजाम तक ले जाती है. जादू – टोना से बचने के लिये मॉ धुमावती हमारी सहायता करती है. बुरी नजर और भूत - प्रेत आदि समस्त मॉ धूमावती के शरण मे होते है.

शरीर के सभी रोग एवम पीडा से मुक्ति के लिए इनकी साधना की जाती है. अभय वरदान देने की क्षमता धूमावती देवी मे है. किसी भी प्रकार के अघोर साधना मे मॉ धूमावती हमारी रक्षा करती है. इसे अलक्ष्मी के नाम से इसलिये जाना जाता है क्योंकी अंजाने मे हमसे तंत्र साधनामे भूल हो जाती है तो मॉ हमारा रक्षण करती है.

सफेद हीरा या बैगनी मोती की माला या काले हकीक की माला का प्रयोग साधना के लिये करे. सूर्य अस्त होने के बाद 6 बार 54 कि माला करे. 

मंत्र 
ओम धु धू धूमावति धूमावति देवै स्वाहा 

धूमावती देवी स्तुति 
प्रातर्यास्यात्कमारी कुसुमकलिकया जापमाला जयन्ती मध्याह्रेप्रौढरूपा विकसितवदना चारुनेत्रा निशायाम् सन्ध्यायां वृद्धरूपा गलितकुचयुगा मुण्डमालां वहन्ती सा देवी देवदेवी त्रिभुवनजननी कालोका पातु युष्मान् ॥ 

बगलामुखी माता

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बगलामुखी माता अत्यंत प्रभावशाली है. यह जबरदस्त ताकद है. 

तंत्र विद्या एवँ शत्रुनाश, कोर्ट कचहरी में विजय यह सब बगलामुखी माता के लिये बहोत आसान काम है. बगलामुखी माता एक भयंकर विनाशक शक्ति है.इस माता का आशिर्वाद पाना बहोत सरल है. लेकिन इसका हाथ हमेशा सर पर बना रहे इसलिए बहोत मेहनत और धैर्य की जरूरत पडती है.

देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध अलौकिक, पारलौकिक जादुई शक्तिओ से भी हैं, जिसे इंद्रजाल काहा जाता हैं। उच्चाटन, स्तम्भन, मारन जैसे घोर कृत्यों तथा इंद्रजाल विद्या, देवी की कृपा के बिना संपूर्ण नहीं हो पाते हैं। देवी ही समस्त प्रकार के ऋद्धि तथा सिद्धि प्रदान करने वाली है, विशेषकर, तीनो लोको में किसी को भी आकर्षित करने की शक्ति, वाक् शक्ति, स्तंभन शक्ति। देवी के भक्त अपने शत्रुओ को ही नहीं बल्कि तीनो लोको को वश करने में समर्थ होते हैं,

यह माता अत्यंत मूडी है. जरूरत पडने पर साधक का भक्षण करने मे भी इसे देर नही लगती. शेरनी जैसे भूख लगने पर अपनेही शावक को स्वाहा करती है उसी प्रकार से बगलामुखी माता भी काम करती है. इसलिये इनकी शरण मे आने के लिये भी शेर का ही कलेजा चाहिये. लेकिन जिस भक्त ने इसे सही ढंग से जाना उसके लिये माता से कोई भी काम कराना मुश्किल नही है. 

परीक्षा में सफलता के लिए, नौकरी मे तरक्की के लिए माँ बगलामुखी की साधना की जाती है. माताके दूसरे रुपोंके विपरित यह रूप भक्त के कहने पर शिफारिश का काम भी करती है. यानी जिस साधक को बगलामुखी माता प्रसन्न हो जाती है वह साधक दूसरे भक्तोंका काम भी माताके जरिये करता है. इसलिये बगलामुखी माता तांत्रिक लोगों मे ज्यादा पोप्युलर है. 

इस विद्या का उपयोग केवल तभी किया जाता है, जब सब रास्ते बंद हो जाते है.हल्दी की 108 कि माला से कम से कम 16 माला जाप करें। यह विद्या ब्रह्मास्त्र है, यह भगवान विष्णु की संहारक शक्ति है. इसका इस्तेमाल करने से पहले दस बार सोचना जरूरी है.

मन्त्र 
ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै ह्लीं ॐ नम:

बगलामूखी स्तुति 
मध्ये सुधाब्धि – मणि मण्डप – रत्नवेद्यां सिंहासनोपरिगतां परिपीतवर्णाम् । 
पीताम्बराभरण – माल्य – बिभूतिषताङ्गी देवीं स्मरामि धृत-मुद्गर वैरिजिह्वाम् ॥

देवी मातंगी

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देवी मातंगी दस महाविद्याओं में नवे स्थान पर अवस्थित हैं तथा देवी निम्न जाती तथा जनजातिओ से सम्बंधित रखती हैं। देवी का एक अन्य विख्यात नाम उच्छिष्ट चांडालिनी भी हैं तथा देवी का सम्बन्ध नाना प्रकार के तंत्र क्रियाओं से हैं। इंद्रजाल विद्या या जादुई शक्ति कि देवी प्रदाता हैं, 

देवी हिन्दू समाज के अत्यंत निम्न जाती, चांडाल सम्बद्ध हैं, देवी चांडालिनी हैं तथा भगवान शिव चांडाल। (चांडालश्मशान घाटो में शव दाह से सम्बंधित कार्य करते हैं) तंत्र शास्त्र में देवी की उपासना विशेषकर वाक् सिद्धि (जो बोला जाये वही हो) हेतु, पुरुषार्थ सिद्धि तथा भोगविलास में पारंगत होने हेतु कि जाती हैं। देवी मातंगी चौसठ प्रकार के ललित कलाओं से सम्बंधित विद्याओं से निपुण हैं तथा तोता पक्षी इनके बहुत निकट हैं।देवी मातंगी अपने घर मे आनेवाले क्लेश एवं सभी विघ्नो को हरने वाली होती है. शादी इच्छुक लडका लडकी मा मातंगी के शरण मे आतेही उचित फल शिघ्र ही मिलता है. संतान प्राप्ति के लिये भी दम्पति को देवी मातंगी के शरण मे आना चहिये. 

इनके रिझल्ट बहोत अच्छे है. पुत्र प्राप्ति के लिए भी माता के शरण मे लोग आते है. लेकिन माता स्वयम नर और नारी कि उत्पत्ती को सृष्टी मे सम समान रूप से पैदा करती है.इसीलिये हर बार आप को लडका ही हो ये माता जरूरी नही समझती. लेकिन आपकी इच्छा अगर उसके कुदरत के नियम अनुसार है और माता कि करुणा मई प्रार्थना की तो पुत्र प्राप्ती के आसार बढ जाते है. इसलिये माता की सेवा बहोत दिल लगाकर करनी पडती है. 

या किसी भी प्रकार कि पारिवारिक समस्या सुलझाने एवं दुख हरने के लिए देवी मातंगी की साधना उत्तम है। 

इनकी कृपा से स्त्रीयो का सहयोग सहज ही मिलने लगता है. लेकिन इस अपरम्पार शक्तिका दुरूपयोग करकर लोगोंके संसार ध्वस्त ना करे. किसी भी स्त्री का पातिव्रत्य भंग ना करे. लेकिन कोई स्त्री मन ही मन मे आपको चाहती है और आपसे भोग की कामना रखती है, तो उस स्त्री के संसार की भी रक्षा देवी मातंगी करती है. यह बडी कमाल की देवी है, जो अपने भक्तोंसे इतना प्यार करती है, कि भक्तोके भोग विलास के लिये यह स्वयम मदद करती है. 

इसके प्राप्ति के लिए स्फटिक की माला का प्रयोग करे बारह माला जप सुर्य देवता उगने से पहले करना चहिए. माला चौपन्न कि हो. 

मंत्र 
ॐ ह्रीं ऐं भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा:

मातङगी मा स्तुति 
श्यामां शुभ्रांशुभालां त्रिकमलनयनां रत्नसिंहासनस्थां भक्ताभीष्टप्रदात्रीं सुरनिकरकरासेव्यकंजांयुग्माम् । 

निलाम्भोजांशुकान्ति निशिचरनिकारारण्यदावाग्निरूपां पाशं खङ्गं चतुर्भिर्वरकमलकै: खेदकं चाङ्कुशं च ॥

कमला माता

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देवी कमला का स्वरूप अत्यंत ही मनोहर तथा मनमोहक हैं. तथा स्वर्णिम आभा लिया हुए है. देवी का स्वरूप अत्यंत सुन्दर हैं, मुख मंडल पर हलकी सी मुस्कान हैं, कमल के सामान इनके तीन नेत्र हैं, अपने मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण करती हैं। देवी के चार भुजाये है तथा वे अपने ऊपर की दो हाथों में कमल पुष्प धारण करती हैं. तथा निचे के दो हाथों से वर तथा अभय मुद्रा प्रदर्शित करती हैं। देवी कमला मूल्य रत्नो तथा कौस्तुभ मणि से सुसज्जित मुकुट अपने मस्तक पर धारण करती हैं, सुन्दर रेशमी साड़ी से शोभित हैं. तथा अमूल्य रत्नो से युक्त विभिन्न आभूषण धारण करती हैं। देवी सागर के मध्य में, कमल पुष्पों से घिरी हुई तथा कमल के ही आसन पर बैठी हुई हैं। हाथीयों के समूह देवी को अमृत के कलश से स्नान करा रहे हैं। 

यभगवान विष्णु से विवाह होने के परिणामस्वरूप, देवी का सम्बन्ध सत्व गुण से हैं. तथा वे वैष्णवी शक्ति की अधिष्ठात्री हैं। भगवान विष्णु देवी कमला के भैरव हैं। शासन, राज पाट, मूल्यवान् धातु तथा रत्न जैसे पुखराज, पन्ना, हीरा इत्यादि, सौंदर्य से सम्बंधित सामग्री, जेवरात इत्यादि देवी से सम्बंधित हैं प्रदाता हैं। देवी की उपस्थिति तीनो लोको को सुखमय तथा पवित्र बनती हैं. अन्यथा इन की बहन देवी धूमावती या निऋतिनिर्धनता तथा अभाव के स्वरूप में वास करती हैं। व्यापारी वर्ग, शासन से सम्बंधित कार्य करने वाले देवी की विशेष तौर पर अराधना, पूजा इत्यादि करते हैं। देवी हिन्दू धर्म के अंतर्गत सबसे प्रसिद्ध हैं. तथा समस्त वर्गों द्वारा पूजिता हैं, तंत्र के अंतर्गत देवी की पूजा तांत्रिक लक्ष्मी रूप से की जाती हैं। तंत्रो के अनुसार भी देवी समृद्धि, सौभाग्य और धन प्रदाता हैं।

मद, अहंकार में चूर इंद्र को दुर्वासा ऋषि ने शाप दिया कि देवता लक्ष्मी हीन हो जाये, जिसके परिणामस्वरूप देवता निस्तेज, सुख-वैभव से वंचित, धन तथा शक्ति हीन हो गए। दैत्य गुरु शुक्राचार्य के आदर्शों पर चल कर उनका शिष्य दैत्य राज बलि ने स्वर्ग पर अपना अधिकार कर लिया। समस्त देवता, सुख, वैभव, संपत्ति, समृद्धि से वंचित हो पृथ्वी पर छुप कर रहने लगे, उनका जीवन बड़ा ही कष्ट मय हो गया था। पुनः सुख, वैभव, साम्राज्य, सम्पन्नता की प्राप्ति हेतु भगवान् विष्णु के आदेशानुसार, देवताओं ने दैत्यों से संधि की तथा समुद्र का मंथन किया। जिससे १४ प्रकार के रत्न प्राप्त हुए, जिनमें देवी कमला भी थीं।

भगवान श्री हरि की नित्य शक्ति देवी कमला के प्रकट होने पर, बिजली के समान चमकीली छठा से दिशाएँ जगमगाने लगी, उनके सौन्दर्य, औदार्य, यौवन, रूप-रंग और महिमा से सभी को अपने ओर आकर्षित किया। देवता, असुर, मनुष्य सभी देवी कमला को लेने के लिये उत्साहित हुए, स्वयं इंद्र ने देवी के बैठने के लिये अपने दिव्य आसन प्रदान किया। श्रेष्ठ नदियों ने सोने के घड़े में भर भर कर पवित्र जल से देवी का अभिषेक किया, पृथ्वी ने अभिषेक हेतु समस्त औषिधयां प्रदान की। गौओं ने पंचगव्य, वसंत ऋतु ने समस्त फूल-फल तथा ऋषियों ने विधि पूर्वक देवी का अभिषेक सम्पन्न किया। गन्धर्वों ने मंगल गान की, नर्तकियां नाच-नाच कर गाने लगी, बादल सदेह होकर मृदंग, डमरू, ढोल, नगारें, नरसिंगे, शंख, वेणु और वीणा बजाने लगे, तदनंतर देवी कमला हाथों पद्म (कमल) ले सिंहासन पर विराजमान हुई। दिग्गजों ने जल से भरे कलशों से उन्हें स्नान कराया, ब्राह्मणों ने वेद मन्त्रों का पाठ किया। समुद्र ने देवी को पीला रेशमी वस्त्र धारण करने हेतु प्रदान किया, वरुण ने वैजन्ती माला प्रदान की जिसकी मधुमय सुगंध से भौरें मतवाले हो रहे थे। विश्वकर्मा ने भांति-भांति के आभूषण, देवी सरस्वती ने मोतियों का हार, ब्रह्मा जी ने कामल और नागों ने दो कुंडल देवी कमला को प्रदान किये। इसके पश्चात् देवी कमला ने अपने हाथों से कमल की माला लेकर उसे सर्व गुणसम्पन्न, पुरुषोत्तम श्री हरि विष्णु के गले में डाल उन्हें अपना आश्रय बनाया, वर रूप में चयन किया।

लक्ष्मी जी को सभी (दानव, मनुष्य, देवता) प्राप्त करना चाहते थे, परन्तु लक्ष्मी जी ने श्री विष्णु का ही वर रूप में चयन किया, जिन्हे मा कमला की जानकारी होती है वह लोग दीपावली पर भी इनका पूजन रचते है।

इस संसार मे जितनी भी सुन्दर लडकीयाँ है वे सब कमला मा के कारण है. सुन्दर वस्तु, सुंदर पुष्प मा कमला कि ही देन है. हर प्रकार की साधना मे रिद्धि सिद्धि दिलाने वाली, अखंड धन धान्य प्राप्ति के लिये मा कमलाके शरण मे आना अनिवार्य है.

भक्तोंके ऋण का नाश करनेमे मा कमला अग्रसर रहती है. अगर कोई साधक महालक्ष्मी जी की कृपा चाहता है तो कमल पर विराजमान देवी की साधना करें। पुराण शास्त्रोंको माने तो मा कमला कि साधना करके ही इन्द्र देव स्वर्ग पर राज कर रहे है.

मा कमला की उपासना के लिए 21 कमलगट्टे की माला बनाये या ले (यानी के कमल के फूल के निचे का लम्बा हिस्सा) और उससे 14 माला मंत्र जप करे. 

मंत्र 
ॐ हसौ: जगत प्रसुत्तयै स्वाहा: 

कमला मा स्तुति 
त्रैलोक्यपूजिते देवि कमले विष्णुबल्लभे । 

यथा त्वमचल कृष्णे तथा भव मयि स्थिरा ॥ 

बिना गुरू, बिना यंत्र, बिना माला और ज्ञान के बिना किसी भी देवी की उपासना ना करे। दस महाविद्या को हासिल करना मामुली साधक का काम नही है. केवल उच्चकोटी के साधक ही अंतिम फल कि प्राप्ति कर सकते है. ॐ

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