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स्पोकन इंग्लिश-course-on-line 1


स्पोकन इंग्लिश

इंग्लिश स्पिकिंग की दुनिया में इतनी सारी किताबें है तो यह और एक किताब क्यों? यह इसके लिये है, क्योंकि इन सब किताबोंका हमने अध्ययन किया और हमे पता चला कि यह सब “स्लो या फास्ट या रॅपिडली” सिखाने का दावा करनेवाली किताबें शायद अंग्रेजी बोलना सिखाती भी होगी लेकिन इन किताबों से जिंदगी के लिये मिलने वला ज्ञान बहुत ही नकारात्मक है. मानो यह लेखक जिंदगी से ऊब चुके है. इसलिये पढनेवाले को मजा नही आ रहा है. दूसरा कारण यह है, कि यह किताबें मनोरंजक नही है.गणित, भूगोल के जैसे यह भी एक रसहीन किताब हो जाती है. तीसरा कारण यह है कि भाषा सिखाने के लिये यह लोग एक बुनियादी गलती करते है....

भाषा सिखाने वाले यह पंडित पहले व्याकरण सिखाने की कोशिश करते है.
अपने बचपन को याद किजिये, हम अपनी मातृभाषा कैसे सीखे थे? क्या हमे अपनी मॉ ने सबसे पहले व्याकरण सिखाया था? बिलकुल नही. सबसे पहले हमने शब्द, वस्तु और व्यक्ति इनका सम्बंध पहचाना.

सबसे पहले हमने शब्द सीखा मॉं’.. उसके बाद हमने आ-कारांत शब्द सिखे जैसे मामा, दादा, बाबा यह सिखने पश्चात हमने चीजोंको जानना शुरु किया. जैसे पानी, रोटी.. इ.

यही नही तब हमने अपनी अलग डिक्शनरी भी बनाई थी. हम चिजोंको अलग तरिकोंसे पुकारते थे. रोटी को हम रोटी नहीं, ताताता” या “नानाना” या ऐसे ही कुछ बोलते थे. तभी मॉ क्या हमे व्याकरण सिखाती थी? नहीं..

उसके बाद हमे प्रशिक्षण मिला घर की चिजोंको पहचानने का. फिर उसके बाद हम अडोस पडोस की चिजोंको जानकर पहचानने लगे. उसके बाद हम स्कूल गये फिर धीरे धीरे बाजार फिर व्यवहार फिर व्याकरण...

अब, इंग्लिश सिखानेवाले पंडित इस कुदरती प्रक्रिया को उल्टा कर देते है. जैसे ही आपने उनकी क्लास मे एड्मिशन लिया कि वह व्याकरण की किताब खोलकर बैठ जाते है. और फिर आप इंग्लिश सिखते वक्त छोटी छोटी गलतियॉ कर देते है तो एक कुत्सित हसी उनके चेहरे पर छा जाती है, जिसे हम पहचान जाते है...

किसीभी भाषा के हम कितने शब्द रोजमर्रा की जिंदगी मे इस्तेमाल करते है? यह जानकर आपको हैरानी होगी कि हम हर रोज तीस से चालीस शब्द ही हर रोज इस्तेमाल करते है. सिर्फ नाम बदलते रहते है. इन वाक्यो मे इस्तेमाल होनेवाले कितने शब्द हम बोलते है? ज्यादासे ज्यादा डेढ सो, दो सो... बस !-
सिर्फ चालीस वाक्य.. और अंगरेजी आप की जुबान पर..

इंग्लिश सिखते वक्त शुरुआत मे ही व्याकरण सिखने की कोशिश ना करे. आपने अपनी मातृभाषा का व्याकरण कभी पढा था? याद किजिये?... शायद पॉचवी या छटी कक्षा मे. तब आपकी उम्र क्या थी? करीब दस, ग्यारह साल! और आपने अपनी भाषा सीखना कब शुरू किया था? करीब दो साल कि उम्र मे. तो साधारणत: आठ नौ साल तक आप बोलते रहे बोलते रहे, लिखते रहे, पढते रहे. फिर कही जाकर आप व्याकरण का अभ्यास करने लगे.मान लिजिये अगर मॉ ने दो साल कि उम्र मे ही व्याकरण सिखाना शुरू कर दिया होता तो? आप डर के मारे अब तक बोल ही नही पाते.
दुर्भाग्यवश इंग्लिश स्पिकिंग की क्लास करने के बावजूद भी लोग इंग्लिश बोल नही पाते... यह हकिकत है...


अब हम अंग्रेजी सीखने के लिये एकदम कुदरती तरिका अपनायेंगे. हम शुरुआत मे ही व्याकरण नही सिखेंगे. बल्कि घरेलू बाते सीखेंगे. घर मे हम तीन चार वाक्यही बार बार दोहराते है. एक, बार बार पुछे जानेवाला सवाल है, “मेरा मोबाईल कहॉ है?” फिर मोबाईलके अलावा हम पेन, रुमाल, घडी, पैसे, जूते, चाभी कुछ भी पूछते है.
अब हम बनायेंगे एक साधारण वाक्य...” वेअर इज माय मोबाईल?” (अब मजा यही से शुरु होगा)

वेअर इज माय मोबाईल?
वेअर इज माय पेन?
वेअर इज माय वॉच?
वेअर इज माय की?

इन वाक्यो मे वेअर इज वैसाही रहता है. सिर्फ चिजोंके नाम बदलते रहते है. है न कितना आसान... मान लिजिये आपने मॉ से पुछा वेअर इज माय शूज?’ तो क्या मॉ आपको शूज कहा है यह नही बतायेगी? जरूर बतायेगी. अब सनातन व्याकरण के हिसाब से यहा पूछ्ना चाहिये,’वेअर आर माय शूज’? लेकिन एक दिलचस्प बात हम आपको बताना चाहेंगे.. हम भारतिय लोग शुद्ध अंग्रेजी बोलते ही नही. हम हमेशा भाषांतरित अंग्रेजी बोलते है. फिर भी हमारा काम चल जाता है.

घर पर आये मेहमानोंसे हम पूछ्ते है,’क्या आप चाय पियेंगे?’ तो यही बात हम अंग्रेजीमें पुछते है,’डू यू ड्रिंक टी?’ यह व्याकरण के हिसाब से गलत है.यहॉ पर होना चाहिये,” वुड यू लाइक टू हॅव सम टी?”

चलिये एक और उदाहरण हम लेते है,’ बारिश गिर रही है इसको हम अंग्रेजीमे हम पुछेंगे,’रेन इज फॉलिंग’, यह गलत है, यहाँ पर होना चाहिये “इट्स रेनिंग”
लेकिन हम व्याकरण के हिसाबसे सही नहीं बोले तो भी सामने वाला समझा नहीं क्या? या बारिश ने गिरने का काम छोड दिया क्या?.....कम्युनिकेशन जरुरी है. डरिये मत....व्याकरण के महारथी आप को डरायेंगे. वो आपके मन मे अंग्रेजी बोलने के प्रति भय निर्माण करेंगे. यहाँ तक के बडे बडे ऑफिसर लोग भी अंग्रेजी बोलने से डरते है, उनका भी कॉन्फिड्न्स ये व्याकरण के महारथी हिला देते है.

अंग्रेजी बोलते वक्त उनके मन मे अजीब डर पैदा हो जाता है,गलती होने का डर. लोग हमे हसेंगे यह डर. यह डर हमारे मन मे आया कहाँ से? (यह हमारे रिसर्च का अहम हिस्सा है) अब हम यहाँ मानसिक विश्लेषणमे जायेंगे... जब हम पाँचवी सातवी के विद्यार्थी थे तब हमें हमारी मातृभाषा का व्याकरण सिखाया जा रहा था. और ठीक उसी वक्त हमें अंग्रेजी यह नयी भाषा भी (व्याकरण के साथ) पढाई जा रही थी...जो हमारे दिमाग के उपर से जा रहा था. शायद तभी मास्टरजी से लेकर सभी बच्चोने हमारा मजाक उडाया... या किसिका मजाक उडाते हुये हमने देखा. और वही डर हमारे जहन मे बैठ गया....

ठीक उसी इंजेक्शन के सुई के जैसा..जिससे बडे बडे तीस मार खाँ डर जाते है. डाक्टर की सुई कितना दर्द पैदा करती है? मात्र चींटी के काटने भर जितना.और हम कितना दर्द सहने कि हिम्मत रखते है? अगर हमारा हाथ या पैर भी जख्मी हो जाय तो भी हम उसे सहेंगे. तो यह सुई का डर आया कहाँ से? यह डर आया बचपन से.

जब हम किसी चीज के लिये जिद करते थे और किसि की नही सुनते थे,तब हमारी नानी या दादी हमे कहती थी,” आने दो डॉक्टर को, वो तुम्हे एक सुई लगायेंगे, बहोत दर्द होगा और तुम रोओगे..” फिर होता यू है कि नानी कि यह बात हमारे जहन मे इस कदर फिट बैठ जाती है,कि हम जिंदगी भर के लिये सुई से डरते रहते है...यही होता है हमारी अंग्रेजी की पढाई के साथ. ग़लती है एज्युकेशनल सिस्टम की, लेकिन सजा हमे भुगतनी पडती है. खैर चलिये कोई बात नही,अभी हम उसी डर को हटाने का काम करेंगे..

देखने जाय तो किसी भी भाषा को व्याकरण नही होता. यह पढकर काफी लोग चौंक गये होंगे. अगर आप गौर करेंगे तो ग्रामिण भारत मे जो भाषा बोली जाती है उसमें तो गालियाँ भी होती है. उसमें बिना मतलब के शब्द समूह मिलेंगे (जिसे मुहावरे कहते है, भाषा के अलावा इन्हें अलग से सिखना पडता है) उस भाषाको शहर वासी लोग शायद निचली स्तर की भाषा समझेंगे. लेकिन क्या वो लोग आपस मे कम्युनिकेशन नही कर पाते है?

यदि हमने व्याकरण के नियमोंका शत प्रतिशत पालन नही किया तो क्या होगा?
मान लिजिये बोलते बोलते आप् ने कहा,’वेअर इज माय जूता?’ या वेअर इज माय चश्मा?’ तो क्या यह गलत अंग्रेजी है? बिलकुल नही. जब हमारी भाषा मे आप साठ प्रतिशत अंग्रेजी घुसेड चुके हो तो अब अंग्रेजी बोलते वक्त हमारे अपने शब्द आये तो क्या बहोत बडा पाप हुआ? बिलकुल नही..लेकिन कम कॉन्फिडन्स वाले लोग खुद पे ही शरमायेंगे. और फिर कभी भी वो जिंदगी मे अंगरेजी बोलने की कोशिश नहीं करेंगे.अब वक्त आ गया है कि हम अंगरेजी पर हुकुमत करे..

इस कम्प्युटर युग मे अब हम एक ऐसे दौर से गुजररहे है जहाँ अंगरेजी सिखना बोलना अनिवार्य हुआ है. सम्पुर्ण विश्व का मानो संगणिकीकरण हो रहा है.सम्पुर्ण विश्व छोटाहो रहा है. कम्युनिकेशन के साधनोंमे तेजी से उन्नती हो रही है.
मजेदार बात देखिये,बच्चा है पांचवी मे, बाप है इंजिनिअर फिर भी मोबाइल फोन को बाप से ज्यादा बच्चा अच्छी तरिके से हँडल कर रहा है.

हमारी आनेवाली पिढी हमसे ज्यादा तेज है. पिछले पचास सालों में मानवी मस्तिष्क बहोत ज्यादा विकसित हुआ है. इसिलिये पूरी दुनिया में एक अजीब बात हो रही है, की पूरा मानव समाज एक ही भाषा मे बात कर रहा है,अंग्रेजी, यह एक प्राकृतिक चमत्कार है.... चलिये आज हम जो वाक्य सिखे उसे कम से कम चालिस बार दोहराईये...
“वेअर ईज माय-----“ रट्टा नही मारना है. मोबाईल, जुते, शर्ट,पेन पूछिये...

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