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History-of-Indian-cinema Episode 5 of 13" Why we are having songs in films"

History-of-Indian-cinema
 Episode 5 of 13

"Why we are having songs in films"

हिंदी फिल्मोंकी एक खासियत है, इनके अंदर के गाने. पूरे विश्व में किसी भी फिल्म में गाने नही होते अलबत्त अगर उस किरदार की जरुरत ना हो. फिर भारतिय फिल्मोंमेही क्यो गाने गाये जाते है?
हजारो वर्षोसे चले आये नाटकोंमे इसका प्रतिबिम्ब दिखाई देता है. यहॉ तक की हमारी एवरग्रीन कथावस्तु 'रामायण' स्वयम एक महाकाव्य है. हम सहित्य कृतियोंमे हमेशा काव्यात्मक बातें करते है. इसिलिये कथा के दरमियान नायक नायिका सिर्फ 'आय लव यू' बोलके मामला खत्म नही होत. वो दोनो अपने दिल के खुशीयोंका इजहार काव्यात्मक ढंग से, दिलकश संगीत के साथ करते है. अगर हमने पुराण शास्त्रोंको देखा तो हमारे देवी देवताओंका भी संगीत से निकट का रिश्ता है.
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भगवान कृष्णजी के हाथ मे 'बांसुरी', भगवान विष्णुजी के हाथ मे शंख, भगवान शिवजी के हाथ मे 'डमरु' इत्यादि हमारे और संगीत के रिश्ते को दर्शाते है. 'कालिदास' 'नल दमयंती' इत्यादि साहित्य कृतियॉ महाकाव्य ही तो है. जरा सोचिये, लता, रफी, किशोर, आशा इनके गाने अपने जिंदगी से डिलिट हो गये तो क्या हो जायेगा? करोडो भारतियोंकी जिंदगी वीरान हो जायेगी. लोगोकी जिंदगी मे स्ट्रेस लेवल बढ जायेगा.
'काम (शृंगार), क्रोध, लोभ(लालच), मोह ,मद (वृथा गर्व), मत्सर(जेलसी)' इन भावनोओंको व्यक्त करने के लिये सुंदर शब्दोंका सहारा लेकर उसे हम बेहरतरीन संन्गीत मे पिरो देते है
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कथा को कहने के लिये संगीतका प्रयोग किया जाता है. हमारे, नाटक, नौटंकी, तमाशा या कोई भी पारम्पारीक लोक कला ले लिजिये उसमे गद्य (डायलॉग) कम और पद्य (गाने) ज्यादा मिलेंगे. तो इसमे हैरानी की बात नही है की हमारी फिल्मोमे गाने क्यो होते है?
हिंदी फिल्मोंके ज्यादातर गाने प्रेम गीत या प्रेमभंग गीत होते है. कम ही सही लेकीन कुछ गाने मॉ, बहन या भाभी पर है. लेकिनएक भी गाना बेटे ने बाप के लिये नही गाया है. शादी के गीत, त्योहारों के गीत, लोकगीत भी फिल्मों मे होतेहै.देश की आजादी से पहले और आजादी के तुरंत बाद देश भक्ती पर काफी गीत आये. (यहॉ तक की युद्ध की पार्श्वभूमी पर पिछले 100 सालो मे सिर्फ चार पाच ही फिल्मे बनी. रीजनल और हिंदी मिलाकर अब तक दस हजार से भी ज्यादा फिल्मे बन चुकी है, लेकिन युद्ध भूमी दर्शाने वाली सिर्फ चार पाच ही फिल्मे...?)
म्युझीक के बारे मे एक युनिवर्सल ट्रुथ है..जो इन्सान अपने उम्र के बाईस पच्चीस साल तक जिन नये गानो को सुनता

है उसे वही बहोत प्यारे लगते है. जैसे जैसे उसकी उम्र बढने लगती है वैसे वैसे वह म्युझिक को दो हिस्सेमे बाट देता है.
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 “हमारा जमाना” और “आज कल का जमाना”
क्या आप लॉ ऑफ प्रपोरशन के बारे मे जांनते है? नही? कोई बात नही,यहा हम बताते है...
नौशाद जी ने अपने इंटरव्यू मे खुद कहा था, की उनके वालिदसाहब (पिताजी) नौशादके फिल्मी संगीत को बेहुदा और वाह्यात मांनते थे. क्योंकी उनके वालिदसाहबको प्युअर क्लासिकल संगीत पसंद था. नौशाद को सुननेवाले, शंकर जयकिशन के संगीत को शोरगुल मांनते थे, शंकर जयकिशन को सुनने वाले आर. डी. को शोरगुलमानते थे, आर.डी. को सुनने वाले बाप्पी लाहीरी को शोरगुल मांनते थे, और यह सिलसिला यो यो हनिसिंग और उससे भी आगे चलता रहेगा...
हॉलिवूड को देखा जाय तो उनके यह, फिल्म इंडस्ट्री अलग है और म्युझिक इंड्स्ट्री अलग है. हमारे यहा दोनो इंड्स्ट्रीज 

एक ही है. कभी कभी हमारे यहा भी म्युझीक अल्बम निकलते है लेकिन  गिने चुने अल्बमही पॉप्युलॅर हो पाते है. खास

 कर 1995 से 2005 मे ऐसे म्युझिक अल्बम ज्यादा पॉपुलर हुए...          

(Did you LIKE this page? Now please read episode 6 for "Reasons behind Westernization of Indian film music



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