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History of Indian Cinema Episode 6 of 13 "Reasons behind Westernization of Indian film music"


History of Indian Cinema
Episode 6 of 13

"Reasons behind Westernization of Indian film music"

अस्सी के दशक से पहले हिंदी फिल्मोका संगीत कभी कभी पाश्चात्य संगीत से प्रेरित हुआ करता था, लेकीन उसमे भारतीय मट्टी की खुशबू भी आती थी. फिर अस्सी के दशक के बाद सम्पूर्ण विश्व पर पाश्चात्य संस्कृती का लाईफ स्टाईल छाने लगा..और हमारे गानों मे अंग्रेजी शब्द,और सही सही वही संगीत आने लगा.. क्या कारण थे इनके पीछे?...
रशिया मे गोर्बाचेव्ह के कारण ग्लास्नोस्तऔर पेरोस्त्राइका की मूवमेट चली और रशियन साम्राज्य बिखरता गया. दूसरे विश्व महायुद्ध के बाद अमेरिका और रशिया इन दो महासत्ताओंमे शीत युद्ध छिड गया. लेकीन यु.एस.एस.आर. के टूटने पर अमेरिका महासत्ता बनकर उभरी. जिसके कारण अब अमेरिकन संस्कृति अब हिप्पी संस्कृति में तब्दील होने लगी. हिप्पी मतलब खाओ पियो ऐश करो’, वह एक्स्ट्रीमलेवल का व्यक्ती स्वातंत्र्यवाद था. इस नये आजाद माहोल मे लोग मस्ती करने लगे,नाचने लगे, पुराने सन्स्कारोंको भूलकर नये के नाम पर कुछ प्रयोग होने लगे. यह प्रयोग संगीतमें भी थे.  
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रॉक, पॉप, जॅझ, डिस्को ऐसा म्युझिक पूरे विश्व मे सर चढकर बोलने लगा. एल्विस प्रिस्ट्ले और उनके बाद  माईकल जॅक्सन ने पूरे विश्व के संगीत प्रेमियोंकी अभिरुची को बदल डाला. उनके प्रोग्राम से प्रेरित एक हिंदी फिल्म आई, “डिस्को डांन्सर”. एल्विस प्रिस्ट्ले के कुछ विडिओज यू ट्युब पर जरूर देखिये “डिस्को डान्सर” का सफेद ड्रेस भी एल्विस की हुबहू नकल है. नकल के बाद्शाह अलोकेश (यानी बाप्पी दा) लाहिरी रातोरात स्टार म्युझिक डायरेक्टर बन गये...
लेकिन एक चौकानेवाली बात आप को बता दू? भारतिय लोगोंको पाश्चात्य संगीत पर थिरकाने वाली बाईस साल की एक पाकिस्तानी लडकी थी. उसका नाम था “नाझीया हसन” जिसने बिड्डू नाम के संन्गीत कार के निर्देशन मे कुर्बानी फिल्म के लियेगाया था.. लैला मै लैला.. उसी के नक्शे कदम पर चल कर साउथ की गायिका उभरी ऊषा उथप” 1980/81 मे ...प्यार करने वाले प्यार करते है शान से... हरि ॐ हरि दम मारो यारो...रम्बा हो हो हो.. तू तो मुझे जान से भी प्यारा है...ऐसे अनेक गाने आये जिनके मौसिकी मे ओरिजिनल अंगरेजी शब्द थे. मजेदार बात बताऊ दोस्तों, पाश्चात्य संगीत पर गानेवाली ये गायीकायें अपने निजी जीवनमें कांजीवरम साडियों मे लिपटी और शर्मिली किसमकी लडकिया थी. लेकीन इनके गाने पर्दे पर अक्सर आधी नंगी हिरॉइन्स के उपर फिल्माये जाते थे.  यह गाने हर जबान पर चढने लगे.और लता मंगेशकर, आशा भोसले, ऊषा मंगेशकर इनकी फीमेल गायकी की मोनोपोली टूटने लगी.  
डिस्को म्युझिक के पॉप्युलर होने के पीछे एक और टेक्नॉलॉजिकल रिवॉल्युशन का हाथ था... वह था लाउड स्पिकर और टू इन वन स्टिरियो प्लेयर. इन दोनो चीजोंपर मुकेश या रफीसाहब के दर्द भरे नगमे सुननेके बजाय..रॉक स्टार के जैसे गला फाडकर चिल्लाने वाले और कानों का पर्दा फाडनेवाले गाने सुनने मे पब्लिक को मजा आने लगा. अब रसिकॉकी जगह पब्लिक ने ली. इस पब्लिक ने एक और इंडस्ट्री को ज्न्म दिया “ऑर्केस्ट्रा”. यह मायकल जॅक्सन के प्रोग्राम्स की हू ब हू नकल थी.
शुरुआती दौर में गुमनाम कलाकार इनमे काम करते थे, लेकीन जल्द ही अमेरिका मे रहने वाले इडियन लोगो मे ऑर्केस्ट्रा की डिमांड बढने लगी. फिर कल्याणजी आनंद्जी,लक्ष्मिकांत प्यारेलाल, किशोर कुमार, मुकेशजी.. भी विदेशोंमे शोज करने लगे. ऑर्केस्ट्रा ने एक और हुनर को जन्म दिया, वह था “मिमिक्री” चहिते कलाकारोंकी आवाज और नाचने कि अलग अदा को लोग पसंद करने लगे. फिर मिमिक्री से भी बढकर स्वयम हिरो हिरॉइन्स को ही एक झलकी दिखाने के लिये बुलाया जाने लगा. अमिताभ बच्चन जैसे टॉप के कलाकार भी उस वक्त फिल्मोंसे ज्यादा विदेशों में ऑर्केस्ट्रामे व्यस्त सो गये थे. इसिलिये अस्सी से नब्बे का फासला फिल्म सृष्टीके लिये मंदी का दौर रहा..
हिंदी फिल्मोंके शुरुआती संगीतमें कुंदनलाल सैगलजी का भरपूर योगदान रहा. उन्होने मेल गायकी को इतना प्रभावित कियाथा कि मोहम्म्द रफी,मुकेश, तलत, किशोर कुमार यह सभी मेल सिंगर सैगल जी के स्टाईल में गाते थे. उस जमाने के संगीतसे जुडे सभी लीजंड्सपर एक नजर डालिये आप को यह महसूस होगा की वो सभी लोग काफी हॅड्सम थे. ऐसा क्यों?  क्योंकी उस जमानेमे प्लेबॅक सिंगिग नही था.अभिनेता ही गायक और गायक ही अभिनेता हुआ करता था. और ये सभी लोग हीरो बनने के लिये आये थे.. तब तक टेक्नॉलॉजी बदल गयी थी और प्लेबॅक सिंन्गिग एक अलग पेशा बन गया था.
फिर जो लोग हिरो नही बन सके वो संगीतके क्षेत्र मे आगये. और तमाम हिंदुस्थानीयोंके दिलोंपर राज करतेरहे.
दो बाते आप से शेअर करके इस लेख को खत्म करने कि इजाजत चाहेंगे. हिंदुस्थानी संगीत की कदर हॉलिवूड को कभी रास ना आयी. इसिलिये कभी हमारे संगीत या पार्श्व संगीत को “ऑस्कर” पुरस्कार नही दिया गया, सिवाय “ए.आर. रहमान” के. इतनी बडी संगीत की परम्परा मे एक ही फीमेल म्युझिक डायरेक्टर का नाम सुनहरे अक्षरो मे चमचमाता हुआ नजर आरहा है, वह है.. ऊषा खन्ना. आज भी जब हम इतनी ज्यादा समानता की बाते करते है और लडकियॉ भी अनेक क्षेत्र मे आगे आ रही है.. तो देश के बेटियोने इस क्षेत्र मे भी अपने परचम लहराने चाहिये.

तब तक ऊषा खन्ना जैसे दिलेर लडकी को हमारा आदरपूर्वक सलाम... (Did you LIKE this page? Now please read episode 7 for "Finding Hindu,Muslim,Sikh,Isaai,Jain,Boauddh,Parasi cultures in Hindi films


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