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No one is pure vegetarian in this world. All vegetarians are Fake.

Vegetarian v/s non vegetarian
शाकाहार v/s  मांसाहार

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जैसे जैसे अलग प्रांतोन्मे मनुष्य की संस्कृती पनपती गयी, वैसे वैसे मनुष्य नामक प्राणी की भाषाएँ अपने अपने भौगोलिक प्रांतोंके अनुसार डेवलप हुई. वैसे ही डेवलप हुई खाने पीने की आदते.

कुदरत ने मनुष्य को मिश्राहारी बना दिया. मतलब के गाय, भैस, हिरन, घोडा ऐसे प्राणियोंको उसने शाकाहारी बना दिया.

 जो सिर्फ घास और घास के प्रजाती की वनस्पती खा कर जिंदा रह सकते है. इससे विपरीत शेर, कुत्ता, बिल्ली, चीता इस प्रकार के प्राणियोंको कुदरत ने मांसाहारी बना दिया, मतलब कि वो सिर्फ दूसरे प्राणियोंकी ही शिकार करके उनका मांस भक्षण करके ही जिंदा रह सकते है.

शाकाहारी और मांसाहारी ऐसे दो हिस्सो मे बाटी इस सम्पूर्ण सृष्टी का हम शास्त्रिय दृष्टिकोण से विष्लेषण करेंगे.



शाकाहारी प्राणियोंके सभी दात, हमारे(यानी इंसानोंके) पीछे के बडे दातोंके जैसे होते है. मतलब हमारे आगे के दात जैसे नुकिले होते है, वैसे नही होते. पूरे के पूरे बडे दात होते है.


मांसाहारी प्राणियोंमे सभी के सभी दात, हमारे (यानी इंसानोंके) आगे वाले दातों जैसे होते है. मतलब हमारे पीछे के दात जैसे दात होते ही नही. पूरे के पूरे नुकिले दात होते है.


अब हम नजर डालेंगे, पाचनसंस्था के उपर. हर एक प्राणी के शरीर मे बडी आत और छोटी आत होती है. 



यहापर बडी मतलब सिलेंड्रिकल वोल्यूम से बडी लेकिन लम्बईमे वो छोटी होती है. और छोटी आत यानी सिलेंड्रिकल वोल्यूम से छोटी लेकिन लम्बाई मे बडी होती है. 



ज्यादा गहराई मे ना जाते हुये इतनाही जानना हमारे लिये काफी है कि शाकाहारी प्राणि को मास जबरदस्ती खिलाया जाय तो उसे हजम नही होगा.और मांसाहारी प्राणी को जबरदस्ती घास खिलाई जाय तो वो उसे हजम नही होगा.





इससे विपरित शाकाहारी और मांसाहारी दोनो प्रकार का भोजन मनुष्य, अपने दातोंसे चबा भी सकता है, और पेट मे पचा भी सकता है. तो कुदरतन मनुष्य मिश्राहारी है, यह हमने जाना.

दुनिया के अलग अलग भौगोलिक पारिस्थितियोंके ऊपर हमने नजर डाली तो अत्यंत बर्फिला प्रदेश टुंड्रा है, फिर थोडा बर्फिला युरोपिअन कोंटिनेंट है, फिर समशितोष्ण तापमान वाला भारतिय उपखंड है. बर्फिले प्रदेशोमे इंसान शाकाहारी बन ही नही सकता, क्योंकि वहा पर पेड पौधे है ही नही. जिंदा रहना है तो मछ्लियोंकी या प्राणियोंकी शिकार करके ही खाना पडेगा. युरोपिअन उपखंड में ठंड ज्यादा होने की वजह से शरीर की केलोरीज ज्यादा बर्न होती है. इसलिये भोजन मे ज्यादा से ज्यादा मास का होना अनिवार्य हो जाता है.

इससे विपरित भारतीय महाद्विप पर गरमी और बारिश ज्यादा होनेके कारण कही कही पर मांसाहार तो कहीपर शाकाहार नजर आता है. अगर भारत के भूगोल को देख लिया जाय तो हमे ये फर्क साफ साफ नजर आता है
.
पहले नजर डाले हमारे कोस्टल एरिया पर. सबसे ज्यादा मछली खाने वाला प्रदेश है कोलकाता. फिर उडीशासे होते हुये चेन्नाई, फिर केरल और महाराष्ट्र तक तटवर्ती इलाको मे ज्यादा मछली खाने वाले लोग मिलेंगे. मध्य भारत यानी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और उत्तर की ओर पंजाब, हरियाणा, उत्तरांचल, बिहार इनमे क्रमशः पंछी और प्राणी, (मुर्गी और बकरा) खानेवाले लोग मिलेंगे.

सिर्फ राजस्थान का कुछ रेगिस्तानी हिस्सा और उससे सटा हुआ गुजरात का कुछ हिस्सा इसमे लोग शाकाहारी है. मतलब के इस सम्पूर्ण धरती पर सिर्फ राजस्थान और उत्तर गुजरात को छोड दिया जाय तो सम्पूर्ण मानव जाती मिश्राहारी है. यह हो गयी मानव वंश, ह्युमन अ‍ॅमॉटोमी से जुडी हुई रिसर्च की बाते. अब हम जानेंगे सामाजिक शाकाहार एवम मांसाहार कि परीभाषा.

दुनिया का सबसे (संख्या से) बडा धर्म है, इसाई इसने मिश्राहार को अपनाया है. फिर सांख्यिकी दृष्टीकोण से बडा धर्म है इस्लाम,उन्होने भी मिश्राहार को अपनाया है, उसके बाद तीसरा सांख्यिक बडा धर्म है,बौद्ध धम्म, उन्होने भी मिश्राहार को अपनाया है.
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इससे ही मिलता जुलता मिश्राहार अपनाया है हिंदू धर्म ने. लेकिन हिंदूधर्म अनेक जातीओंका समूह है. इसमे 98% पॉप्युलेशन मिश्राहार मे विश्वास रखती है. सिर्फ 2% - 3% उच्च वर्ण के लोग शाकाहार के फॉलोअर्स है. इनके अलावा जैन धर्म जो मुख्यत्वे राजस्थान मे फैला हुआ है उनके फॉलोअर्स शाकाहार मे विश्वास रखते है. भगवान रिषभनाथ से भगवान महावीर तक जैन फिलोसफी मे विश्वास रखने वाले अब भारत मे 4 मिल्लिओन (पूरे इंडिआ के पॉप्युलेशन के 0.4%) फोलोअर्स है.

हिंदूओंके उच्चवर्ण का शाकाहार और जैनोंका शाकाहार इसमे कुछ फर्क है, कुछ समानताये है. हिंदू उच्चवर्णिय सिर्फ मांस ही नही खाते. जैन इससे भी आगे जाकर प्याज, लहसून (और बटाटा) भी नही खाते.

अब हमे शाकाहार और मांसाहार दोनो कि परिभाषा को जानना होगा. शाकाहार मे वनस्पती से मिलनेवाली सभी चीजोंका सेवन किया जाता है. मसलन बीज (अनाज) फल, पत्ते, फूल (फ्लॉवर की सब्जी), स्टेम, मूल यहा तक कि दंठल (लौंग भी). इसके अलावा ये मध (हनी) को शाकाहार मानते है. कई विचारवंन्तों के अनुसार मध का सेवन एक क्रूर काम है. क्योंकी मधुमख्खीयोने मधु उनके अपने पिल्लोंके लिये इकट्ठा किया हुआ है. जब उसे हम चुराते है तो मधुमख्खीयोंके लाखो भ्रूण पर्याप्त भोजन ना मिलने से मर जाते है. ये भयानक हिंसा है. क्योंकि अगर कुदरत ने शाकाहार के लियेशहद कि रचना कि है, तो मधुमख्खी को इतने भयंकर दंश की क्षमता क्यों दी है? अपनेपरिवार या पिल्लोंके भोजनके रक्षण के लिये ही ना !

शाकाहार कि फिलोसफी विश्वास रखती है, कि गाय या भैंस का दूध शाकाहार है. यह एक फिलोसोफिकल बुद्धीभ्रम है.
दूध तो गाय या भैस के मास और रक्त से बनी एक रासायनिक जैविक चीज है. दूध, छास, बटर, दही, चीज, आईस्क्रीम इनको शाकाहार कि फिलोसफी मे बिठाना साईंस के दायरे को मंजूर नही है. शाकाहार के सनातन (orthodox) फोलोअर्स तो वनस्पतीयोंके बीज खाते है. चावल, गेहूँ इनमे भी जान है, तो इसे क्यों खाया जाता है. अगर किसी शाकाहारी इंसान को जले हुये या एकदम सूखे गेहू या चावल खानेके लिये दिये जाय तो वो क्या कहेगा? “अरे,इसमे तो जान ही नही है..” मतलब तुम बीज एवम फलोंकी “जान” खाते हो. अलबत्त जिन वनस्पतियोंको तुम खाते हो उनमे भी तो “जान” होती ही है. दूध का दही बनाने के लिये करोडो जिंदा जंतु काम आते है

, ये तो पाँन्चवी कक्षा का बच्चा भी जानता है.

बेचारा गाय का बछडा, उसका दूध छिनने का हक तुमको किसने दिया?  फिर कुछ सनातन (orthodox)शाकाहार के फिलोसोफर्स अपने आप को फसते हुये देखकर ऐसा दावा करते है, की गाय,भैस का दूध पीना मांसाहार के जैसा ही है. इसलिये वो नारियल का दूध निकालकर पीते है.

अब इन लोगोंके किये और ज्यादा मुसीबत पैदा हो गयी, की गाय,भैस के दूध को मांसाहार मान लिया.. बडी गडबड हो गयी... क्योंकी अब बताओकि माँ के कोक से जन्म लेने के बाद छे महिने तक तुम्हारा आहार क्या था? माँ का दूध? अब साईंस ये कहता है, कि पहले घंटे मे माँ के आंचल से बहने वाला गाढा दूध बच्चे के लियेसबसे अच्छा होताहै.क्योंकी उसमे करोडो उपकारक जिंदा जंतु होते है.

आपकी जानकारी मै अपडेट करूँ.. एक माँ के ब्रेस्ट के अंदर कि दुग्ध कोशिकाओंसे तब तक दूध बाहरआना शुरू नही होता जब तक उसके ब्रेस्ट के निपल्स कि हलकी सी स्कीन की परत निकल नही जाती.. उसे निकालने का काम उसका बच्चा ही करता है. वो स्किन निकलकर बच्चे के पेट मे ही तो जाती है. इसका मतलब सैध्धांतिक रूप से सभी मानव प्राणी जनम से ही मांसाहारी है.

फिर मानवी समाज का इतना छोटा समुदाय (विश्व जनसंख्या अनुसार) शाकाहार कि यह फिलोसफी सबके उपर लादने के लिये क्यो आमादा है? उसका कारण है, सांस्कृतिक आक्रमण. मै श्रेष्ठ तू कनिष्ठ यह भावना.. तथा कथित संस्कृति स्वयम घोषित रक्षक.. अपने श्रेष्ठत्व को जताना चाहते है

, दिखाना चाहते है. इसीलिये यह बुद्धी भ्रम जान बूझकर फैलाया जाता है.

जिसके लिये कमजोर लोग धर्म का स्वांग रचाते है. फिर मै नही खाता,तो तू भी मत खा ऐसी भयंकर नफरत भरी हिंसात्मक सोच यह लोग फैलाते है.


भारतीय सम्विधान ने सबको अपने अपने धर्मोंका पालन करने का समान अधिकार दिया है, तो किसी भी धार्मिक सोच को दूसरे धर्म के लोगोंपर कम्पल्सरी डालना एक असम्वैधानीक कदम है. जय हिंद. 


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