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अगर आपको घुटने में पीठ में दर्द है, और आप एक महिला है, तो इसे जरूर पढे



अगर आपको घुटने में पीठ में दर्द है, और आप एक महिला है, तो इसे जरूर पढे





 भारतिय महिलाओमे यह पाया गया है कि, करीब करीब पैतीस साल कि उम्र के बाद, या एक या दो डिलिवरी के बाद  घुटने का दर्द, पीठ दर्द यह एक आम समस्या है. आज हम इस पीडा के बारे मे जानकारी हासिल करेंगे.


  इन पीडाओंका राज छुपा है हमारी लाईफ स्टाईल में. याद किजीय कुछ ज्यादा वक्त नहीं गुजरा है, हमारी नानी माँ या दादी माँ कैसे खाना पकाती थी? लकडी के चुल्हे के उपर (या अंगिठी के उपर) और यह सब क्रीया जमीन पर बैठकर होती थी. आजसे करीबन पच्चीस तीस साल पहले हमारे जीवन मे एक विशाल परिवर्तन आया, कुकिंग गेस. अब महिलायें खडी होकर काम करने लगी. ध्यान दीजिए, मनुष्य बैठनेवाला प्राणी है. घोडा या हाथी के जैसा खडा रहनेवाला प्राणी नहीं है.


  तीस चालीस साल पहले हम बच्चोंकी स्कूल दस से पाँच की होती थी. लेकिन पिछले पच्चीस सालोंमे 'अंग्रेजी' माध्यम कि स्कुले भोर भये शुरू होने लगी. जिसके चलते नयी मम्मीयोंको सवेरे पाँच बजे उठकर किचन मे खडा होना पडता है. फिर दोपहर के करीब एक बजे तक वो खडी रहती है. फिर शाम पाँच बजे खडी हो जाती है रात के ग्यारह बजे तक. कुल मिलाकर रोज 14 घंटे औरते खडी रहती है. 600 स्क्वेअर फीट के घर मे अमुमन एक भारतिय स्त्री आठ से नौ किलोमिटर तक चलती है. 14 घंटे खडे रहना और नौ किलोमिटर हररोज चलना, जिसमे एकभी दिन कि छुट्टी नहीं. अब सोचिये क्या होगा रील की हड्डी का? घुटनोंका..


  आईये नजर डाले हमारे किचन के कुकिंग टेबल पर. इस टेबल कि हाईट होती है, "तीस इंच." तीस इंच ही क्यूँ इसका जवाब किसी कढिया, किसी सिविल इंजिनीअर के पास नहीं है. "अर्गोनोमिकल साईंस", मतलब इंसानी शरीर का उसके फर्निचर के साथ 'डायमेंशनल' सम्बंध. इसकी पहल एक सायंटिस्ट 'हारमन मिलर' ने कि. उसने दस हजार लोगोंके शरीर के नाप लिये. फिर उसकी औसत निकालकर कुछ प्रमाण निश्चित किये. जैसे कि, कुर्सी की सीट जमीन से साढे सतरह इंच पर होनी चाहिये. हेंडल्स नौ इंच पर होने चाहिये, सीट अठरह इंच बाई अठरह इंच होनी चाहिये इ. अब उसने यह तय किया कि किचन टेबल की उँचाई तीस इंच की चाहिये. फिर हम भारतियोने उसका अंधानुकरण किया. हमारी माता बहनोंके हाईट का हमने जरा भी विचार नही किया. गडबडी यही पर हुयी.. इन सबका हम विस्तार से अध्ययन करेंगे.


  'हारमन मिलर'साहब ने जिन व्यक्तियोंका अध्ययन किया वो सभी युरोपिय वंश के थे. युरोपिय वंश की महिलायें औसतन साढे पाँच फीट उंची होती है. जबकी भारतीय स्त्रीयाँ औसतन पाँच फीट उंची होती है. यह आधे फीट का फरक हमने हमारी किचन टेबल मे परिवर्तित नहीं किया. युरोपिय किचन टेबल के अंदर ही 'कुकिंग रेंज' फिट होता है. इसके विपरीत हमारे यहाँ कुकिंग चुल्हे होते है. जिसकी उंचाई 6 इंची होती है. उसके उपर बर्तन रखे जाते है. हमारी माताओंको 'फ्रोजन शोल्डर' कि तकलीफ, पीठ दर्द कि तकलीफ कहाँ से मिलती है, जानिये. रोटियाँ बेलते वक्त उनके कंधें अ-नैसर्गिक तरीकेसे उपर की तरफ हवा मे रहते है. छोटे बडे काम करते वक्त वो आगे की तरफ झुककर काम करती है, जिसके कारण 'जोईंट्स पर्मनंटली डेमेज' हो सकते है.


  हमारे इंजीनियर्स, इंटिरियर डिझायनर्स से मेरी बिनती है, कि जिस महिला को जिंदगीभर जिस किचन मे खडा रहना है उसकी उंचाई का विचार करके टेबल कि हाईट रखे. हमने पाश्चात्य जीवन शैली अनुसार टेबल तो लिया लेकिन एक चीज हमने नही ली, वो है, हाईट एड्जस्टेबल स्टूल. दूसरा बडा फरक ये है, कि युरोपिय औरते किचन मे सिर्फ आधे घंटे तक ही होती है. और भारतीय औरतें 14 घंटे.. क्योंकि इंडियन खान-पान में जरूरी होता है प्रिपरेशन. जिसके लिये अनेक बर्तनोका प्रयोग होता है. और अनेक पदार्थो का भी. तो अब पीठ दर्द से बचने के लिये बीच बीच में हाईट एड्जस्टेबल स्टूल का प्रयोग करें. और अगर आपकी उंचाई कम है तो एक लकडी का छोटासा 8 इंच का 'स्टेण्ड' बना लिजीये. पीठ दर्द कम हो जायेगा. 

     

  पीठ दर्द का दूसरा कारण विस्तार से जानिये. मनुष्य प्रजाति एक 'स्तन-धारि' जीव है. सभी 'स्तन-धारि' जीव पिल्लोंको जन्म देते है. और उन्हे दूध पिलाते है. गर्भावस्था के दरमियान इंसान को छोड सभी प्रजातियोंकि मादायें चार पैर पर अपना वजन बेलंस करती है. लेकिन इंसान दो पैरोंपे चलने वाला जीव है. अब इंसान की मादा गर्भावस्था के दरमियान अपना और बच्चेका वजन कितना भी बढे, दो पैरों पर सम्भालती है. पेट के वजन को सहारा देते हैं कमर एवम पीठ के स्नायु. इसके साथ युवा अवस्था मे जिस ब्रेस्ट का वजन 100 ग्राम होता है वह लगभग डेढ किलो तक बढता है. ब्रेस्ट में किसी प्रकार के स्नायु नहीं होते. जिसके कारण पीठ के स्नायुओंपर अतिरिक्त खिचाव आ जाता है.


  बच्चा जब छोटा होता है तब माँ के आँचल मे दूध ज्यादा होता है, लेकिन जैसे जैसे बच्चा बडा होने लगता है दूध कम होने लगता है. बच्चे की भूख बढने लगती है और मुँह के मसल्स भी मजबूत होने लगते है. परिणाम स्वरूप बच्चा ताकत के साथ दूध पीने की कोशिश करता है, जिसमे पुन: एक बार पीठ के स्नायु खीचते है. डिलिवरी के बाद महिलाओंमे केल्शियम कि कमी होने लगती है. उनकी हड्डियाँ अंदर से हल्की होने लगती है. डिलिवरी के दरम्यान रील कि हड्डी के उपर जोर देने के कारण कई बार एल वन, एल टू, एल थ्री मणके या उनके बीच की गद्दी दबती है. जो उम्र ढलने लगतेही दर्द का रुप धारण कर लेती है.


  औरतोंके कमर का हिस्सा मर्दोंके कमर से ज्यादा बडा होता है, क्योंकि उन्हे माँ बनने का सौभाग्य प्राप्त होता है. डिलिवरी के बाद ज्यादातर महिलाओंमें अतिरिक्त चरबी सीना, बाजु, कमर, बटक्स, जंघाओंके उपर अटक जाती है. गडबडी ये है, कि उनके पैरोंके तलुओंकी साईज चौदह साल कि उम्र में बढना बंद हो जाती है. चाहे कितना भी वजन बढ जाय. जहाँ तक पुरुषोंका सवाल है, तो उनका वजन जैसे बढता है वैसे पैरोंका साईज भी बढता है. परिणामत: औरतोंके घुटनोंपर एवम पैरोंके तलुओंपर 'पोईंटेड फोर्स' पडता है, जिसके कारण उन्हे चलने मे दिक्कत होती है. उन्हे जल्दी थकावट आ जाती है. और घुटनोंका दर्द उनका साथी बन जाता है.


  तीसरा कारण है हमारी, संस्कृति. इण्डियन औरते, किचन को अपना राजपाट बना देती है, जिसमे एंट्री करने कि मर्दोको इजाजत नहीं होती. तो अक्सर एक सामान्य घर का सीन ये है, कि मर्द लिविंग रूम मे बैठते है और औरत सब के लिये चाय, पानी, खाना किचन से ला लाकर देती है. फिर सब झूठा सामान बारी बारी उठाकर अंदर भी लेकर जायेगी. अगर पती, लडका या ससूर ने मदद करना चाहा. तो जवाब मिलता है, 'तुम रहने दो, मैं सब सम्भाल लूँगी'. लडकोंको उनकी माताओने बचपन से सिखाया ही नही कि किचन मे छोटे छोटे कामोमे कैसे मदद की जाति है. फिर जब वो माता चालीस के उम्र की बन जाती है तब अचानक अठरह बीस साल के लडके से अपेक्षा करती है कि वो मेरी मदद करे. संस्कारोंकी वजह से वो भी अपने पापा के जैसा बिना किसी की परवाह किये बिना हॉल मे टी.वी. देखता रहता है.


  अब हमने अपने लाइफ स्टाईल एवम गलतीयोंको जाना. कोशिश यही रहें कि अपने आप को दर्द से बचायं नहीं तो हर रात आपका एक साथी सिरहाने कि तरफ रहेगा, 'बाम कि डिब्बी' ! 

             

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