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Places to see near Haridwar-Rishikesh-gangotri, how reach at Haridwar

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सुबह सुबह हम हरिद्वार पहुंचे. समस्त भूमी को देव भूमी कहा गया है. फिर ऋषीकेष. आगे उपर पहाडी पर उत्तर काशी और बाद मे गंगोत्री. हमने अबतक पहाडोंके ऊपर बादलोंको उतरते हुये देखा है. वो भी बारिश के मौसम मे. यहा पर पहाड इतने उंचे है कि सफेद बादलोंको चूमने वो आसमान मे घुस जाते है. इतने उंचे पहाड की दूसरे किसीभी प्रांतकि पहाडियोंसेभी दस गुना ज्यादा उंचे.. इन पहाडोंकी वादिया एक के पीछे एक दूर दूर ब्लू कलर की फ़ेंट होते हुये नजर आती है.
पहाडोंके लोगोंके जितने सुंदर लोग मैंने आज तक नही देखे. सुंदरता उनके मनकी,सुंदरता उनके हेल्पिंग नेचर की. उनके बोली मे हरियाणवी, गढवाली, हिमाचली लहजा जब मिक्स हो जाता है तो उनकी देसी भाषा मे भी संगीत सुनायी देता है. हा, ये पहाडी लोग अपने आप मे गुनगुनाते हुये आपको मिलेंगे. इसका कुछ खास कारण है.
उंचे उंचे भव्य पहाडोंमे आपको एक या दो ही घर दिखाई देंगे. हमे बडा आश्चर्य होता है इतनी उंचाई पर इन लोगोने पक्के मकान कैसे बांधे होंगे और सबसे बडी बात उपर नीचे हर बार कैसे आते जाते होंगे? ना शहर की थीयेटर की सुविधा है ना हस्पताल की... शायद टि.वी. भी घर मे ना होगा.. इसी वजह से उनका संगीत बॉलीवूडी शोर शराबा से दूर है. बिलकुल अंनछुई तितली की तरह. मैंने एक लम्बे चौडे खूबसूरत बूढे बाबा से पूछा,” बाबा, कोई बीमार होता है पहाडी मे, तो आप लोग डाक्टर के पास कैसे पहुचते है?”
गहरी झुर्रियोदार मजबूत शरीर के बंदे ने बडा सुंदर जवाब दिया,” बाबुजी, ये पहाडिया, झरने, और खेतों की देसी उपज हमे बीमार होने ही नही देती. यहा पहाडी बकरीयोंका दूध पीजीए, देसी मुर्गा या हरी सब्जी खाईये खुल्ली हवा मे सास लिजीए.. आप बीमार ही नही होंगे...” फिर वो मुस्कुराया. उसकी झुर्रियोन्मे भी मुझे बच्चे की, गुदगुदाती हुई मासुमियत नजर आयी. आप यकीन मानिये, अगर वो लोग बीमार होते होंगे तो शहरी या विदेशी सैलानियोंके सम्पर्क मे आने के बाद. मेरी सोच को उस बंदे ने हिला दिया था... अब मै जान बूझकर ऋषीकेष, उत्तरकाशी के गलियोमें डॉक्टर की पाटी ढूंढ रहा था.. लेकिन जो भी मिले दो चार, उनकी भी प्रेक्टीस शायद चलती नही होगी.. ऐसी खस्ता हाल...
उत्तरकाशी के बाद आपकी गाडी गंगोत्री के पहाड चढते वक्त आपको एहसास होने लगता है, कि आप कितने छोटे है और कुदरत कितनी विशाल... गंगा मैया का अल्हड कुवारी लडकी के जैसा छलकता हुआ रूप देखकर हम रोमांचित हो जाते है... मैय्या के पानी की धारा छोटी हो जाती है.. अब आप सपनोंकी दुनिया मे खोने लगते है. गाडी का रस्ता बहोत डेन्जर हो जाता है. अगर गाडी चार उंगली भी खिसकी तो सीधा दो हजार फूट खाई मे. लेकिन जान मुठ्ठी मे पकड के रखिये साक्षात गंगा मैया आपके रक्षण के लिये खडी है. हवाये बेहद ठंडी हो जाती है, गाडी के शीशे अब बंद करने पडते है. इंजन की गरमाहट ऐसे महसूस होती है जैसे गाडी ठंडी सास भर रही हो. जाडे के मौसम मे लोगोंको बात करते वक्त उनकी सासोंसे निकलनेवाली भाप को आपने देखा होगा.. बस आपकी गाडी वैसे ही नजर आने लगती है..
ड्राईवर से आप बात करने का प्रयास करतेहै. इस वक्त वो आपसे बात नही करेगा... उसका ध्यान सडक के मोड पर और “कान” मोड के उस पार ना दिखनेवाली सामने से आनेवाली गाडी के आहट पर होती है. जबरदस्त एकाग्रता के साथ वो गाडी चला रहा है. इनके गाडीयोमें अब म्युजिक भी बंद होता है. शायद वो लोग प्रभू का नाम मन ही मन मे लेते होंगे.
साक्षात प्रभू शिवजी ने अपने त्रिशूल से इन पहाडोंको तराशा होगा इतने सीधी काट्वाले उंचे पत्थर नजर आते है.. गोल गोल घुमती हुई गाडियोंमे अब चक्कर आने और उल्टी होने के पक्के चान्स होते है. इसीलिये नीचे उत्तर काशीमे ही उल्टी से बचनेवाली गोलिया मेडिकल से ले लीजीए. फिर भी आप उल्टी से नही बच सकते. क्योंकी अब हवा पतली होने लगी है. कान के अंदर उसका कम दबाव महसूस होता है. फिर आप थूक निगलकर कान का प्रेशर सही करने की नाकाम कोशिश करोगे. बीच बीच मे मिल्ट्री की गाडिया  मिल्ट्री के जवान उनके बेस को देखते हुये आगे बढते है.
जहा से आपकी गाडी जा रही है वहा से थोडी उपर नजर डालते है तो अक्रोड और सेब के पेड नजर आने लगते है. गाडीको रोककर अपने हाथोंसे सेब तोडकर खाने के लिये आपका जी तरस जायेगा.... तुरन्त गाडी रोककर सेब के बागान मे घुस जाइये..
ये पहाडी लोग इतने दिलदार है, कि आपको रोकेंगे नहीं. जितना मर्जी चाहे आप सेब खाओ. बस शर्त है कि साथ मे लेकर मत जाओ. पंछियोने चोच से गिराये हुये हजारो सेब आपको मिलेंगे. असल मे वो बहोत स्वदिष्ट होते है. क्योंकी जो फल स्वादिष्ट होता है उसे ही पंछी खाने का प्रयास करते है. इतने मधुर और मीठे सेब मैं ने अपनी जिंदगी मे नही चखे. जैसा ही बाईट लेते है रस कि फुव्वारे निकलती है. आम के रस के जैसे यह रस भी हाथ से कुहनी तक आयेगा और आपको अब बच्चा बनने से कोई नही रोक सकता. कुहनी की तरफ बहनेवाले रस को, आपकी जीभ जरूर सुर्र करके चूसेगी. बडा आनंद आता है फिरसे बच्चा बनकर. फिर किसी महिला की खिलखिलाती हुई हसी आपको चौकन्ना कर देती है. वो सेब चुनने वाली कामकाजी महिलाये है. इतनी गोरी गोरी और सुंदर कि बस देखते रह जाय. यकिनन लगता है काश, मेरी मा भी इतनी सुंदर होती,तो मै भी सुंदर होता..
अब हमारा ध्यान जाता है उनके कपडों पर. इतनी बेहतरीन बारिक नक्काशी उनके उनी कपडोपर होती है कि जी करता है उफ मेरे पास भी ऐसे कपडे होते.. धीरज रखिये.. मौका तो आयेगा ही. अब दिल की धडकने बढने लगती है, और हम गंगोत्री मे पहुच जाते है. यहा पर मात्र चार सौ रुपये के किराये पर हॉटल का लकडी से बना हुआ दस बाय पंधरा का रूम मिल जाता है.
होटल मे रूम सर्विस नही मिलती, लेकिन लोग बहोत शालिन और मधुर भाषी है. गंगोत्री की मार्केट आपका इंतजार कर रही है.
रूम मे जाते ही ऊनी कपडे पहन लीजीए. महसूस होता है, एक विशाल डीप फ्रीझर मे आप है. गंगा की धारा की कान के पर्दे फाडने वाली गर्जना ध्वनी कंटिन्युअस सुनाई देगी. अब फ्रेश होकर हम आ जाते है. लेकिन जैसे ही पानी मे हाथ डालते है, हम ठंड से चिल्लाते है. अब शायद टॉयलेट मे भी आप गरम पानी मांग सकते है. एक बाल्टी गरम पानी का पूरा पचास रुपया लेगा. क्योंकि होटलवाला बतायेगा कि हम केरोसीन पर पानी गरम करते है.
असली मलाईदार दूध की भरपूर चाय कि चुस्किया आप लेते है. मजा आ जाता है. अब गरम गरम खाने का ऑर्डर मे अगर आपको कुछ ऑर्डर करना है तो शहर मे मिलने वाली फेंसी आईटम छोड दिजिये. बडे प्यार से किचन मे चले जाईये. कोई आपको रोकेगा नही. और रसोईये को पूछिये कि, ”भाई, आपके हाथ की क्या चीज हम खाये जिसे हम आपका खाना खाने यहा बार बार आये..” वो बडे शालिनता से कहेगा गेहूकी रोटी और दाल फ्राय. थोडी देर इंतजार करनेके बाद आपको दाल की खुशबू आने लगेगी. अब ठंडा मौसम उसमे गरम गरम तडके वाली बेहतरीन स्वादिष्ट दाल और फूली हुई रोटिया... आ हा हा... कितनी रोटिया आप खा रहे है, गिनती मत कीजिये.. कितने दाल तडका आप खायेंगे गिनती मत किजिये.. बिल ज्यादा नही आयेगा...
ऋषीकेश से लेकर गंगोत्री तक भरपूर खाने की राईस प्लेट मिलती है मात्र पचास रुपये मे. जिसमे होती है, गेहू की चार तंदूर रोटिया, पनीर पालक की बडी वाटी, बडी वाटी भरी हुई और एक स्वादिष्ट सब्जी (जैसे चना मसाला,या बैगन का भर्ता), एक बहोत ज्यादा दाल तडका और बहोत बहोत ज्यादा देसी राईस. रोटी मिलेगी पर पीस आठ से दस रुपये मे. सब कुछ कम से कम मसालों मे मिला हुआ. अब भूख भी ज्यादा लगती है. पीने के पानी के लिये बोटलवाला पानी नही लेना है. लोकल पानी पीजीए. जब गंगा मैया के आंचल से निकला अमृत समान पानी है तो प्रोसेसिंग डिस्टिल्ड वॉटर क्यों लेना? हॉटल की बात छोडिये, पहाडीसे बहता हुआ पानी इतना निर्मल होता है, कि उसे भी हम पी सकते है.
मा गंगोत्री के पवित्र मंदिर के आजू बाजू की उंची उंची पहाडिया और नजारा देखने लायक बनता है. हम पूनम की रात आठ बजे वहा पर पहुचे थे. चांद चमकदार बादलों की शॉल लिये उपर आ रहा था. और इतने मे लाईट चले गये. मै आनंद से हल्का सा चीखा भी.. क्योंकी वो नजारा शानदार था. कृत्रीम मानव निर्मित बल्बोंकी रोशनी अब नही थी.. बस वो पूनम का चांद, हिमालय की गोद.. पीछे दूर बरफ से ढकी पर्वत कि चोटिया... और गंगा मैय्या के धारा की आवाज...हम लोग उसी चांद की रोशनी मे सैर सपाटे के लिये निकले.

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मार्केट मे भीड थी ही नही. सभी दुकानदार बाईस से पच्चीस साल के नौजवान थे. अपने केरोसिन कि बत्तिया उन्होने जलाई. वो नजारा सपनो के जैसा था. यहा पर सिर्फ दो सौ रुपये मे बेहतरीन उन का अत्यंत सोफ्ट लेडीज स्वेटर मिलता है. टेडी बेअर से भी सोफ़्ट शोल दो सौ मे मिलती है. सौ रुपिये मे ठंडी की मन्की केप मिलती है. मात्र छ सौ रुपये मे इतना शानदार उनी जर्किन मिलता है, जिसकी कीमत शहरोंमे शायद तीन हजार रुपये होगी.. (वो भी इतना खूबसूरत ना होगा.) और एक चीज यहा से आप लीजीए.. गढवाली शोल. ये लम्बी चौडी चद्दरनुमा.. हाथ से बुनी हुई, बेहतरीन नक्काशी के साथ. गढवाली रंग का कोम्बिनेशन थोडा अलग प्रकार का होता है. और डिझाईन पेटर्न काफी अलग प्रकार का होता है. थोडासा निगोशिएशन करते ही बेचारा दुकांनदार आपके सामने झुक जाता है. फिर हमे अंदर का इंसान बेचैन कर देता है.
सोचते है, यही हम मॉल मे होते तो क्या हम मोल भाव कर सकते थे? फिर क्यो ना इन मेहनती लोगोंको जो मांग रहे है वो दाम दिया जाय. क्योंकी शायद इससे उस बेचारे बुनाई के कारिगर का बच्चा एक वक्त कि रोटी खा सके...
रात को मंदिर बंद होता है सात बजे. और सवेरे खुलता है पांच बजे. हम लोगों ने रात को मेडिटेशन किया. एक अदभुत शांती का एहसास हो रहा था. सवेरे छे बजे उठकर पहले एक ही काम किया.गरम पानी से नहाये. तैयारी करके हम मंदीर जा रहे थे कि सूर्य नारायण ने हमे सोनेसे नहला दिया. बर्फिले पहाडोंसे रिफ्लेक्ट होकर चारो तरफ से आनेवाली रोशनी अत्यंत सुनहरी और स्वच्छ मालूम होती है. गंगोत्री मा का दर्शन हमने किया.
यहा पर कुछ एजंट आपको गुमराह करने की कोशिश करेंगे. पूजा पाठ या पित्रु दोष के लिये कुछ एक हजार रुपये मागेंगे.. उनसे सावधान रहिये. गंगा के पवित्र जल को भरने के लिये प्लास्टिक के जार पहले से साथ मे रखिये. उसमे पवित्र गंगा जल भर लिजिये. ध्यान रहे ऊपर कोई बंदा स्नान कर रहा होगा, ब्रश करके टूथ पेस्ट गंगा मे थूक रहा होगा, कोई शौच क्रिया कर रहा होगा... उनसे भी उपर की तरफ जाईये और गंगा जल भर लिजिये. ज्यादा पानी मे मत जाईये यहा पानी बेहद ठंडा है. हल्का सा छीटाछटी अपने उपर कर लिजिये. हृदयसे गंगा मैय्या को वंदन किजिये. नदी के पात्र के नजदिक ऋषी भगिरथ का भी स्थान है उसे वंदन किजिये.
गंगोत्री मा के मंदीर के ठीक सामने अखंड धुनीवाला काल भैरव का स्थान है उसे भी वंदन किजीए.. हर जगह पुजारी आरती मे पैसे डालने के लिये मजबूर करेगा. तो जैसे आपकी इच्छा...
कुछ समय बिताकर उसी दिन लौटने का हमने फैसला किया. उत्तर काशी से उपर गंगोत्री जाने के लिये बस भी मिलती है और टेक्सी भी. बस से जाना बिलकुल भी उचित नही है. क्योंकी जब चाहे जहा चाहे हम रुक नही सकते. फोर सीटर टेक्सी वाला उपर जाना और नीचे आने के लिये साढे तीन हजार रुपये लेता है. सिर्फ जाना तीन हजार रुपये लेगा. क्योंकी कई बार लोग गोमुख तक जाते है. गोमुख तक जाने के लिये मिल्ट्री बेस कि परमिशन लेनी पडती है और आगे का सफर घोडे से तय होता है. घोडे से आठ घंटे का जाना और आठ घंटे का आना होता है. और एक दिन रुकना होता है.
उत्तरकाशी से ऋषीकेश हर आधे घंटे मे बस होती है. लेकिन बसे बहोत छोटी और संकरी होती है. लेग रूम बिलकुल नही होती. यह दूरी आठ घंटे की है. किराया दो सौ बीस रुपये होता है. और बीच मे चम्बा मे करीब करीब एक घंटे के लिये रुकती है. पूरे रास्ते पर बहूत दूर दूर तक कोई गाव नही होते. दोपहर दो बजे के बाद ना उत्तरकाशी से कोई बस या टेक्सी मिलेगी ना ऋषीकेश से. टेक्सी से जायेंगे तो साढे चार हजार रुपये एक साईड का किराया हो जाता है. अगर ऋषीकेशसे ही टेक्सी हायर करेंगे तो वाया उत्तरकाशी नौ हजार मे आप गन्गोत्री तक जाकर आयेंगे.
आपको जानकारी दे दू कि हरिद्वार या ऋषिकेश के लोग, यहा तक के ट्रेवलिंग एजंट भी गंगोत्री के सफर के बारे मे बिलकुल भी नही जानते. वहा पर जाने से वो आपको डिसकरेज करेंगे. ऐसा क्यों? पता नहीं...
ऋषीकेश के उपर दो हजार फूट पर प्राचीन शिव मंदिर है वहा जरूर जाईये. वहा जाने के लिये राम झूला क्रोस करके उस पार जाईये. इस पार से टेक्सी मत हायर किजिये. इस पार से ग्यारा सौ रुपिये पर टेक्सी लेंगे. उस पार से शेअर टेक्सी एकसो सत्तर रुपये पर सीट लेते है या पांचसौ रुपये मे पूरी टेक्सी... सिर्फ जाने के लिये.. प्राचीन मंदिर पहुंचकर बहोत कनफ्युज हो जायेंगे. कि मंदिर के अंदर प्रवेश कहा से करे? अनेक अनेक टपरीनुमा हॉटेल्स के अंदर से गुजरना पडता है. अंदर मार्ग दर्शाने वाले बोर्ड भी कनफ्युजन पैदा करते है. मंदिर के ठीक नीचे से बहोत बडा जल प्रपात निकलता है. वहा पर अनेक स्त्रिया, लडकिया, एवम पुरुष नहाते है. आखिर मे आपको अंदर जानेका रस्ता मिल जाता है. भक्तगण बम बम भोले की ध्वनि घोषणाए करते रहते है. मंदिर मे मूल शिव लिंग छोटा सा है जिसे बडे धातू कि परत से ढक दिया है. हॉटलमे पचास रुपयेवाला राईस प्लेट भरपेट खाईये, जो पूरा खतम नही होता. अब लौट के नीचे ऋषीकेश आ जाईये.
हमारा नसीब इतना जोरदार था कि हमे बिलकुल गंगा किनारे वाला “आश्रम” ऐसा बोर्ड वाला होटल रूम रहनेके लिये मिला. शाम को हमने गंगा मे डुबकी लगाई. पानी बेहद ठंडा होने के बावजूद भी नहाने के बाद एकदम गरम महसूस होता है. कुछ विदेशी सैलानी भी गंगामे नहाने का लुत्फ उठा रहे थे.
मेरी राय से हरिद्वार से भी ऋषीकेश ज्यादा शांत और पवित्र है. “हर की पौडी” नामक घाट मूल हरिद्वार रेल्वे स्थानक से चार पाच किलोमिटर दूर है. तो चलके जाने से थकावट महसूस होगी. गंगा किनारेवाली गलियोंमे कपडे और धार्मिक चीजे इनके अलावा छोटे छोटे होटल है. मीठा पसंद करनेवाले असली मलाई की लस्सी और मलाईदार रबडी जरूर चखे. या इन गलियोंकी भीड से बचना है तो इलेक्ट्रिक पर चलनेवाली शेयर रिक्शा आपको बीस बीस रुपये मे पहुंचा देगी. पौडी पर भक्तोंके भीड से भी ज्यादा एजंटो की भीड है. कर्मकांड के बीच फसे हुये भक्तोंको लूटते हुये एजंट देखकर दुख होता है. सिर्फ पूजा पाठ के लिये ही नही, भिखारियोंको भीख देना, भूखे को रोटी देना इसके लिये भी एजंट होते है. भीड मे पिक-पॉकेटर से सावधान रहिये. औरतोंको नहाते वक्त ताडने वाले आंबट-शौकीन लोगोंसे भी औरतोने सावधान रहना चाहिये. यहा पर पानी मे नहाते वक्त जंजीरोंके अंदर ही नहाये. गंगा के मुख्य प्रवाह मे जाने का प्रयास ना करे. क्योंकी मुख्य प्रवाह मे अंदर भवरे है. पानी बेहद ठंडा है. हो सकता है कि आप ठंडी से ठिठूर जायेंगे.इसलिये पहलेसे ही थर्मस मे गरम गरम चाय साथ मे रखे.
रात के वक्त हर की पौडी पर होनेवाली गंगा आरती का नजारा देखने लायक बनता है. इन सभी यादोंको मन के सीप मे मोती की तरह संजोकर आप घर लौटते है फिर भी सपने मे.. यादोंमे वो... पहाडिया, वो लोग... वो विहंगम दृष्य तरोताजा ही रहते है.

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