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Places near baroda(Vadodara), maharaja fatehsingh museum



Places near baroda(Vadodara), maharaja fatehsingh museum



बडौदा! एक ऐतिहासिक शहर! इस शहर के "नवापुरा" एरिया कि पहचान है, महाराजा फतेह सिंघ म्युजियम. भव्य "लक्ष्मी विलास पेलेस" मे यह म्युजियम हमारे स्वाभिमानि इतिहास को दर्शाता है.

इस म्युजियम कि खासियत है, "राजा रवी वर्मा" कि ओरिजिनल अतिभव्य पेंण्टिग्स.
यहाँ कुछ ब्रिटिश और हिंदुस्तानी चित्रकारोंने मिलकर अद्भुत बहोत बेहतरीन चित्रोंका निर्माण किया है, यह देखने लायक है.

यहा फोटोग्राफि करना मना है. इसलिये मोबाईल फोन एवम केमेरा अंदर नही ले जाना सख्त मना है. सोमवार को यहाँ छुट्टी रहती है. बाकि दिन सवेरे 10.30 से यह खुलता है शाम के 5.30 बजे तक. सामान्य लोगोंके लिये प्रवेश शुल्क है, 25 रू.




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इस महल के 22 आलिशान कमरोंमे यह म्युजियम फैला हुआ है. हर एक चीज को ध्यान से देखते वक्त 3 घण्टे का वक्त आराम से कट जाता है. हर एक चीज को बहोत साफ सुथरा और सम्भालकर रखा हुआ है. स्थानिय मेंनेजमेंट सैलानियोंका खास ध्यान रखती है. 
   
यहाँ कोई गाईड नही होता है. जगह जगह पर आलेख लिखे हुये है. इन्हे पढते हुये और चीजोंको समझते हुये धीरे धीरे आगे हम बढते है, तो तीन घण्टे कम पड सकते है. इसलिये सम्पूर्ण दिन खाली रखिये, जिसमे कोई मोबाईल कोल आप अटेण्ड नही कर सकते.

महल कि भव्यता के कारण अंदर विशेष शांति और ठंडक का एहसास होता है. अंदर खाने पीने की चीजे ले जाना मना है. बारह पंद्रह साल से छोटे बच्चोंको लेकर मत जायिये. उन्हे कुछ समझ मे नहीं आयेगा और बोअर हो जाते है.
बडे बुजुर्ग, जिन्हे घुटने की पीठ दर्द कि शिकायत है, नही जाये. क्योंकी 22 कमरे घूमना अच्छा खासा व्यायाम है. बहोत बार लोग थक जाते है और पहले चार कमरे देखकर ही लौट जाते है.
      
युद्ध कालिन सामग्रीयाँ, ऐतिहासिक पोषाख, ऐतिहासिक बर्तन, कलाकुसर कि वस्तुएँ, वाद्य सामग्री, पत्थर कि मूर्तियाँ इनकी डिटेलिंग देखते देखते इनके मोह मे इतने फस जाते है. कि वक्त का ध्यान ही नही रहता.

इस म्युजियम मे एक और खास बात है इनके अंदर के स्कल्प्चर्स. धातु कि मूर्तियाँ. मुर्तियोंके उपर के भावोंको देखना एक सुखद अनुभव है. जिन्हे आर्ट और स्कल्प्चर मे विशेश रुची है, इन लोगोने यहाँ अवश्य आना ही चाहिये. 

दरवाजे पर स्वागत करती हाथी की मूर्ती, दो मयूर पंछियोंकि मूर्ति, और स्वयम पेलेस इन सबको देखकर हम चकित रह जाते है. महाराज सयाजिराव गायकवाड (III) इन्होने इस म्युजियम की रचना की. इससे पहले यहाँ रोयल फेमिली का स्कूल एवम रेसिडंस हुआ करता था. यह जगह हमे ना सिर्फ ऐतिहासिक ग्यान देती है बल्कि एक नेत्र सुखद अनुभव भी देता है. स्कूल, महाविद्यालयीन विद्यार्थियोंके लिये यह स्थल एक प्रेरणादाई जगह है.  

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