Shri yantra, Shri vidya (Hindi blog)



Shri yantra, Shri vidya 


ideazunlimited.net
Shrividya vanchha kalp ganapati

'श्री विद्या एक प्राचीन' शास्त्र है, जिसमें अक्सर मेरु यानी 'पर्वत' या मेरू पर्वत की पूजा की जाती है. शाक्त परम्परा और शैव परम्परा दोनो मे पर्वतोंकी पूजा होती है. शैव परम्परा शिवजी को अक्सर 'कैलाश पर्वत' के साथ जोडती है. जहाँ शाक्त परम्परा यह मानती है, कि आदि शक्ति माँ स्वयम 'पर्वत' है. इसीलिये 'मेरु लक्ष्मी' को पूजा जाता है. वैदिक काल के बाद जब पुराण काल का उदय हुआ तब शाक्त और शैव परम्पराओंका मिलन हुआ. भगवान शिव जी मंदिरोन्मे 'शिवलिंग' के रूप मे पूजे जाते थे. उनका सिर्फ अकेले सन्यस्त रूप पूजा जाता था. (नव) नाथ परम्परा में तो शक्ति (स्त्री) का मुख देखना भी निषिद्ध माना गया.

लेकिन पुराण काल में देवी देवताओंके 'पारिवारीक' रूपोंका पूजन होने लगा. गणपती भगवान जो स्वयम सिद्ध है, बालक का रूप लेकर माँ पार्वती के गोद मे जाकर बैठ गये और शिवजी तांडव या उग्र रूप छोडकर 'सौम्य' मुस्कुराते हुये 'पिता' एवम 'पारिवारिक' रूप मे आ गये. अब घर घर मे शिवजी के परिवार के चित्र की पूजा होने लगी.

वहाँ स्वयम वायुपुत्र हनुमांनजी अकेले होते है तो अत्याधिक बलशाली होते है, जो पर्वत को हाथ मे उठाये मंदिरोमे पूजे जाते है. लेकिन जब वो श्रीराम जी के मंदिर मे होते है, तो घुटनोंके बल सौम्य रूप मे पाये जाते है. श्रीराम जी, माता सीता के साथ शायद लक्शमणजी होंगे या नही लेकिन हनुमान जी जरूर होते है. लेकिन शिवजी के पुत्र गणेश को जो स्थान परिवार के साथ मिला वो लव और कुश को श्री राम और माता सीता के साथ 'पारिवारिक' पहचान के साथ नहीं मिल पाया.

यहाँ तक कि भगवान कृष्ण के साथ राधाजी को मंदिरोंमे स्थान मिला लेकिन ये स्थान उनकी दोनो पत्नियाँ, या भगवान कृष्ण के बेटोंको नहीं मिला. इससे विपरीत गणेशजी के साथ रिद्धी, सिद्धी को स्थान मिला.
आगे चलकर पुराण काल मे ही शिवजी और पार्वती मैया का अर्धनारिनटेश्वर का रूप पूजा जाने लगा. जो प्रथा दक्षिण मध्य भारत से शुरू हुयी और उत्तर भारत तक पहूंची. जहाँ तक दक्षिण भारत का सवाल है, 'नम्बुदरिपाद' ब्राम्हणोंके कुछ गुरुओंको स्वयम्भू गणपति ने माता लक्ष्मी के रूप मे दर्शन दिये. जिनके बारह हाथ है. जो माता का 'मेरु' रूप पूजते थे. गणपतिजी का माता लक्ष्मी के रूप मे पूजा जाना एक विलक्षण घटना थी. लेकिन भारत के उत्तर प्रांत मे यह रूप जा न सका, क्योंकि बीच मे 'महाराष्ट्र' है. 'महाराष्ट्र'के सबसे बडे हिंदु राज्य शासक 'छत्रपति शिवाजी महाराज' स्वयम शक्ति के पूजक थे, 'माता भवानी देवी, माता अम्बा' ये उनके बलस्थान थे. परंतु शिवाजी महाराज के पश्चात 'पुणे' के पेशवे राज्य पर आये, उनका आराध्य दैवत था, गणपती जी, जो अकेले मंदिर मे पूजे जाते थे. इसीलिये महाराष्ट्र मे ज्यादा करके सिर्फ और सिर्फ गणपती जी को अकेलेही पूजा जाता है. जैसे कि किसीभी अष्ट विनायक के मंदिर की मूर्ति.
इन मंदिरोन्मे गणपतीजी के 'लक्ष्मी' रूप का विरोध हुआ. इसीलिये यह रूप वही पे रुक गया. प्रांतो का विचार करे तो गुजरात और राजस्थान मे भगवान कृष्ण के राधाजी के साथ मंदिर ज्यादा मिलेंगे. महाराष्ट्र मे गणपती जी के मंदिर ज्यादा मिलेंगे
उत्तर और मध्य प्रदेश में श्रीराम के मंदिर ज्यादा मिलेंगे. कोलकता, उडीशा मे माता दुर्गा देवी एवम काली माँ के मंदीर ज्यादा मिलेंगे. साऊथ इंडिया मे जगन्नाथ और अयप्पा के मंदीर ज्यादा मिलेंगे.

लेकिन हम सब एक मजेदार युग से गुजर रहे है, जहाँ पर हमारी परमपराओंको लेकर हम अति-सनातन नहीं है. हमारी जिग्यासा अब अलग अलग प्रांतोमे एक ही देवता के अलग अलग रुपोंको जाननेकि है. अब गणपती महोत्सव गुजरात मे भी होते है, और महाराष्ट्र में भी रास-गरबा का आयोजन होता है. जगन्नाथ रथ मध्यप्रदेश मे भी होता है, और रामलीला आंध्रप्रदेश में भी.. इन्ही विशाल जानकारियोंके साथ मैंने गणपतीजी का "लक्षी" रूप शेयर किया, जो बैथे हुये नहीं, खडे है, और ध्यान से देखे ये खडे भी नहीं, चलने कि मुद्रा मे है. जिनके हाथ में हरा गन्ना, गेहूँ, फल, त्रिशूल,माथे पर चांद (भगवान शिवजी का प्रतिक) गदा, सुदर्शन चक्र,(भगवान विष्णुजी का प्रतिक) सब कुछ है,है, जिसे "श्री विद्या वांछ कल्प गणपती" के नाम से जाना जाता है... इनकी पूजा करके तो देखिये बडे अद्भुत परिणाम मिलते है. हरीॐ .. 

No comments:

How to convert TV into SMART TV- Turorial

How to convert TV into SMART TV-Turorial I am using this product Anycast for more than 4 months time. This is working absolutely fi...