प्रेक्टिकल हिप्नोटिजम with Tratak (Hindi)





धुनिक समाज का, आध्यात्मिक स्वास्थ्य यह विषय, शायद ही कभी चर्चा का विषय रहा है।

हर कोई शारीरिक स्वास्थ्य,  मानसीक स्वास्थ्य के बारे में जानता है लेकिन आध्यात्मिक स्वास्थ्य के बारे में कुछ भी नहीं।

पश्चिमी दार्शनिक, आध्यात्मिक स्वास्थ्य के बारे में बहुत कम जानते हैंजहां भारतीय दार्शनिकों ने 'आध्यात्मिक स्वास्थ्य' पर बहुत संशोधन किया है।

इस आधुनिक दुनिया में, मनुष्य रोगों पर शोध करने में व्यस्त हैं। हर कोई बीमारी पर काम कर रहा है। यही बात मनुष्यों के लिए एक खतरा है।

पुराने दिनों में, लोगों को स्वास्थ्य की चिंता थी, न कि बीमारियों की। इसलिए वे खुश थे, जीवन का आनंद ले रहे थे।

आध्यात्मिक गतिविधियाँ सभी के जीवन का अभिन्न अंग थीं। खाने की आदतें, भोजन, संगीत और कलाएँ सब कुछ आध्यात्मिकता से संबंधित था।

आधुनिक विश्व में केवल 10%  परिवार नियमित रूप से आध्यात्मिक गतिविधियाँ कर रहे हैं।

तथाकथितआधुनिक समाज आध्यात्मिक गतिविधि को पिछड़ेपन के प्रतीक के रूप में लेता है।

मनुष्य प्रकृति को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है। वे जानवरों, सब्जियों, फसलों पर प्रयोग कर रहे हैं, बदले में मनुष्य को प्रदूषित वस्तुएँ ही मिल रही हैं।

प्रकृति को नियंत्रित करने के चक्कर में; पशुओं, सब्जियों, फसलों का स्वास्थ्य गिर गया और स्थिति और जटिल हो गई है। एक विशाल रूप से, स्वास्थ्य की जगह बीमारियों ने ले ली है। इससे मामला ऐसा बिगड गया कि, अनेक बीमारियोंने  इंसान को पकड़ लिया।

शारीरिक बीमारी, मानसिक बीमारी आधुनिक मानव जीवन का अभिन्न अंग बन गई है।
जेट स्पीड के युग में, कोई भी एक सेकंड के लिए इंतजार करने के लिए तैयार नहीं है। रोगी तेजी से ठीक होने के लिए डॉक्टरों पर दबाव डालना शुरू कर देते हैं  और डॉक्टर दवा कंपनियों को रोगी को तेजी से ठीक करने के लिए, भले साइड इफेक्ट्स होते है, ड्रग्स बनाने के लिए कहते हैं।

मानव ने प्राकृतिक प्रणाली में अराजकता पैदा की है जिसके परिणामस्वरूप बीमारीयाँ पैदा हुई है।

इसके अलावा, प्राकृतिक जल संसाधन, जैसे झील, नदी और समुद्र प्रदूषित कर दिये हैं।

विकास के नाम पर, पहाड़ों और जंगलोंको मानव नष्ट कर रहा है।

वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण सब कुछ हमारे स्वास्थ्य को और भी गिरा रहा है।

बीमारी का एकमात्र उपाय स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित करना है; शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ आध्यात्मिक स्वास्थ्य! 

आध्यात्मिक और धार्मिक दोनों अलग-अलग शब्दावली हैं।

आध्यात्मिक का मतलब धार्मिक नहीं है। एक धार्मिक गतिविधि का अर्थ आध्यात्मिक गतिविधियों से नहीं है।

एक आध्यात्मिक गतिविधि का अर्थ पैरा-मानसिक गतिविधि भी नहीं है।

यह एक प्राचीन विज्ञान है, जो अद्भुत परिणाम देता है।

प्रत्येक मानव, जीवन में मानसिक और आध्यात्मिक विकास एक लय में करता है।

आठवीं कक्षा तक, हम नास्तिक होते हैं। हमारी शिक्षा प्रणाली हमें नास्तिक होना सिखाती है।

नौवी कक्षा के बाद,  हम किसी भी मंदिर या मस्जिद में, कम से कम एक बार, ’बोर्ड परीक्षा के कारण जाना शुरू करते हैं।

दसवीं कक्षा में, हम पचास प्रतिशत, आस्तिक हो जाते है। अच्छे अंक प्राप्त होते हैं। हमें विश्वास होता है कि हमारे पीछे कुछ "सर्वोच्च शक्ति" काम कर रही है। फिर भी अभी तक हम धार्मिक नहीं हैं।

एक दिन आप स्नातक बन जाते हैं,  और नौकरी ढूंढने के लिए निकल पडते हैंफिर से आप मंदिरों में जाना शुरू करते हैं। किसी तरह, आप रोजी रोटी कमाना शुरू करते हैं।

इस बीच, शादी के बाद माँ के घर को छोड़ कर, लडकियाँ ससुराल चली आती है। गर्भावस्था से गुजरने के बाद महिलाएं, प्रसव समय भगवान पर ही निर्भर होती हैं। वे इस समय सबासे अधिक धार्मिक हो जाती हैं।
 
पुरुष अभी भी अपने करियर में कार्यरत हैं। कई लक्ष्य वो प्राप्त कर रहा हैं। वह इस बात से चिंतित नहीं है कि भगवान है भी या नहीं। क्योंकि वह खुद को, अपने परिवार का भगवान घोषित कर देता है। उसके बच्चे, पत्नी बूढ़े माता-पिता सभी उसकी दया पर हैं।

पैंतालीस से पचास की उम्र में, वह बीमार पड़ जाता है।

वह, पहली बार खुद के लिए किसी की मदद चाहता है। वह अपने अहंकार के कारण बच्चों, या पत्नी या बूढ़े माता-पिता द्वारा मानसिक सहायता नहीं मांग सकता। फिर भगवान की प्रार्थना करने का ही एकमात्र उपाय बचता है।

पचपन साल की उम्र के आसपास उनके चाचा, चाची, पिता या माता की मृत्यु हो जाती है। इस पल में, वह हिल जाता है। अब मृत्यु के बाद के जीवन का पता लगाना वह शुरू करता है। भिक्षुओं के बारेमें, मन की शांती, या धार्मिक गतिविधियों में उसे रुची होने लगती है।

फिर साठ के बाद, वह जीवन के अंत तक पूरी तरह से धार्मिक और आध्यात्मिक बनता है।

एक महिला पैंतालीस साल की उम्र के बाद अधिक आध्यात्मिक हो जाती है क्योंकि उनका मासिक चक्र रुक जाता है। अपने जीवन को वो बेस्वाद होते देखती है।, क्योंकि वह अधिक फर्टाइल नहीं है। नब्बे प्रतिशत महिलाएँ हार्मोनल परिवर्तनों के बाद संपूर्ण  धार्मिक बन जाती हैं।

एक महिला को कई शारीरिक और मानसिक समस्याएं होने लगती हैं,  अब उसे आध्यात्मिक और धार्मिक शक्तियों की मदद की जरूरत है।

इस बीच अगर वह (चचेरी क्यों न हो) दादी, नानी बन जाती है, स्वयं के बच्चों से भी पहले, वह जीवन के इस चरण में तो किसी का दादी, नानी बुलाना उसे परेशान करता है। वह अपने पति से जल्दी आध्यात्मिक रास्ता स्वीकार करती है।

आध्यात्मिक स्वास्थ्य की श्रृंखला में सम्मोहन और आत्म सम्मोहन सबसे ऊपर है। इसका कारण हमारा 98% स्वास्थ्य हमारी विचार शक्ति पर निर्भर करता है।

सम्मोहन द्वारा सोचने की शक्ति और मानसिक शक्ति में वृद्धि होती है।

हिप्नोटिजम  आधुनिक सिलेबस में शामिल करना चाहिए, जैसा कि पश्चिमी विश्वविद्यालय करते हैं।

प्रेक्टिकल हिप्नोटिजम जानने के लिए इस पुस्तक को ध्यान से पढ़ें।

हिप्नोटिजम सीखने की गुरुदक्षिणा,बॅचेस मे, 5,500/-,  

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वॉट्सअप विडिओ कोलिंग द्वारा प्रशिक्षण 7,000/- 

ट्रीट्मेंट 500/- प्रति सेशन। 

क्लास हररोज डेढ घंटे 5 दिनोंके लिए।
 
डॉ.ईश्वरभाई जोषी  

email :- ishwarbhaijoshi23@gmail.com ,

सूरत

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